आज उसी अजमेर जेल में कैदी बनकर लौटी फरार महिला जेलर दिव्या चौधरी
राजस्थान के प्रशासनिक और जेल विभाग के इतिहास में भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और नाटकीय ड्रामे का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है जिसने हर किसी को सन्न कर रख दिया है। कभी अपने रुतबे, शानो-शौकत और दबंग अंदाज के लिए जानी जाने वाली अजमेर की पूर्व महिला जेलर दिव्या चौधरी (Divya Choudhary) के जीवन में ऐसा चक्रव्यूह रचा कि उनके सारे अरमान धरे के धरे रह गए। कभी जिस जेल की मुख्य कुर्सी पर बैठकर वे अपने मातहतों को आदेश दिया करती थीं और कैदियों पर अपना कड़ा रौब झाड़ती थीं, आज वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि उसी जेल के सलाखों के पीछे उन्हें एक आम कैदी की तरह रातें गुजारनी पड़ रही हैं। भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में लंबे समय से फरार चल रही और पुलिस की आंखों में धूल झोंक रही दिव्या चौधरी की यह नाटकीय गिरफ्तारी और फिर उसी जेल में वापसी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है, जहां की वे कभी सर्वेसर्वा हुआ करती थीं। आइए विस्तार से जानते हैं कि किस तरह से एक जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी के दिनमान पूरी तरह से बिगड़ गए और वे कानून के शिकंजे में फंस गईं।
आलीशान जिंदगी और रसूख के पीछे छिपा था भ्रष्टाचार का काला सच: कैसे शुरू हुई दिव्या चौधरी की मुश्किलें
दिव्या चौधरी जब अजमेर केंद्रीय कारागार (Ajmer Central Jail) में जेलर के पद पर तैनात थीं, तब उनके कार्यकाल के दौरान लगातार इस तरह की शिकायतें मिलने लगी थीं कि जेल के भीतर नियमों को ताक पर रखकर वीआईपी सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं और इसके एवज में भारी-भरकम रकम वसूली जा रही है। शुरुआती दौर में प्रशासनिक हलकों में इन चर्चाओं को ज्यादा तूल नहीं दिया गया, लेकिन जब भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) और अन्य जांच एजेंसियों को इसके ठोस सबूत हाथ लगने लगे, तो शिकंजा कसना शुरू हो गया। जांच में यह बात खुलकर सामने आई कि जेल के अंदर बंद बड़े अपराधियों और तस्करों को अवैध रूप से फोन इस्तेमाल करने की छूट देने से लेकर उनके खानपान और मुलाकात के नियमों में बड़े पैमाने पर हेरफेर किया जा रहा था। जब इन तमाम गंभीर मामलों की फाइलें खुलीं और विजिलेंस की जांच आगे बढ़ी, तो दिव्या चौधरी समझ चुकी थीं कि अब उन पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है, जिसके बाद उन्होंने कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए रातों-रात फरार होने का रास्ता चुन लिया।
गिरफ्तारी से बचने के लिए लंबी लुकाछिपी का खेल: पुलिस और एसीबी की टीमों ने ऐसे बिछाया था जाल
कानून के हाथ लंबे होते हैं और इस बात का अहसास एक बार फिर साबित हुआ जब फरार चल रही पूर्व जेलर दिव्या चौधरी को पकड़ने के लिए राजस्थान पुलिस और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। गिरफ्तारी से बचने के लिए दिव्या ने देश के अलग-अलग हिस्सों में छिपने के ठिकाने बदलने शुरू कर दिए और लगातार अपनी पहचान छिपाने की कोशिश करती रहीं, ताकि कोई उन तक न पहुंच सके। लेकिन तकनीकी सर्विलांस, मुखबिरों की सटीक सूचना और पुलिस की विशेष टीमों द्वारा डाले गए चौतरफा दबाव के आगे आखिरकार उनकी एक नहीं चली। जब पुलिस ने उनके हर एक संभावित ठिकाने पर दबिश देनी शुरू की और उनके करीबियों पर शिकंजा कसा, तो उनके पास समर्पण करने या पकड़े जाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा। इस लंबी और नाटकीय लुकाछिपी के अंत में जब उन्हें गिरफ्तार किया गया, तो पूरे प्रशासनिक महकमे में भूचाल सा आ गया कि किस तरह एक खाकी पहनने वाली अधिकारी खुद कानून की गिरफ्त में आ गई।
उसी अजमेर जेल में कैदी के रूप में वापसी: जहां कभी चलता था सिक्का, अब हर पल काट रहा है सजा की तरह
इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और सबक सिखाने वाला पहलू तब सामने आया जब कानूनी प्रक्रियाओं और अदालती आदेशों के तहत दिव्या चौधरी को न्यायिक हिरासत में उसी अजमेर जेल में लाया गया, जहां उन्होंने कभी बतौर जेलर राज किया था। कल्पना कीजिए उस अधिकारी की मानसिक स्थिति का, जो कल तक बड़े-बड़े अपराधियों को अपने एक इशारे पर बैरक में बंद करवाती थी, और आज वही उसी जेल के गेट पर उतरकर एक साधारण कैदी की नीली या सफेद पोशाक में दाखिल हो रही है। जेल के अन्य कैदी और कर्मचारी भी इस दृश्य को देखकर हैरान थे कि वक्त बदलते देर नहीं लगती। कानूनी जानकारों का मानना है कि यह मामला उन सभी भ्रष्ट अधिकारियों के लिए एक बड़ा सबक है जो अपने पद और कुर्सी का दुरुपयोग करके कानून से ऊपर समझने की भूल करते हैं। फिलहाल दिव्या चौधरी से जुड़े इस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई तेजी से चल रही है, और अदालत के रुख पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।