नवरात्रि में घर के मुख्य द्वार पर ऐसे बनाएं स्वास्तिक: वास्तु गुरु से जानिए सही विधि और नियम
देशभर में इस समय चारों तरफ मां दुर्गा की भक्ति, पंडालों की रोशनी और मां के जयकारों की गूंज के साथ पावन शारदीय नवरात्रि (Sharad Navratri) का पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाया जा रहा है। सनातन संस्कृति और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के ये नौ दिन मां आदिशक्ति को प्रसन्न करने और अपने घर-परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश कराने के लिए सबसे उत्तम माने जाते हैं। इन दिनों लोग अपने घरों की साफ-सफाई करने के बाद मुख्य द्वार से लेकर पूजा स्थल तक कई तरह के धार्मिक और मांगलिक चिह्न बनाते हैं, जिनमें 'स्वास्तिक' (Swastik) का चिह्न सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र माना गया है। प्रसिद्ध वास्तु गुरुओं और ज्योतिष शास्त्रियों का यह कहना है कि यदि नवरात्रि के शुभ अवसर पर घर के मुख्य द्वार पर सही नियम, सही दिशा और सही सामग्री से स्वास्तिक बनाया जाए, तो मां लक्ष्मी और मां दुर्गा की असीम कृपा प्राप्त होती है और घर में कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं होती। आइए विस्तार से जानते हैं वास्तु के नियमों के अनुसार स्वास्तिक बनाने की सही विधि और उससे जुड़ी जरूरी सावधानियों के बारे में।
हिंदू धर्म में स्वास्तिक का महत्व: क्यों माना जाता है इसे विघ्नहर्ता और सौभाग्य का प्रतीक चिह्न
सनातन धर्म में किसी भी शुभ कार्य, पूजा-पाठ, गृह प्रवेश या व्रत-त्योहार की शुरुआत करने से पहले कुमकुम, हल्दी या रोली से स्वास्तिक बनाने की प्राचीन परंपरा चली आ रही है। संस्कृत शब्द 'सुवास्ति' से बने इस चिह्न का शाब्दिक अर्थ 'कल्याण, मंगल या अच्छा होना' होता है, जो भगवान गणेश और माता लक्ष्मी दोनों की ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। वास्तु शास्त्र के जानकारों के अनुसार, स्वास्तिक की चार रेखाएं चार दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) और चार वेदों का प्रतीक होती हैं, जो ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करके घर के भीतर नकारात्मक शक्तियों का प्रवेश रोकती हैं। नवरात्रि के इन नौ दिनों में यदि मुख्य द्वार या मंदिर की दीवार पर नियमपूर्वक स्वास्तिक अंकित किया जाए, तो घर में आ रही तमाम बाधाएं और वास्तु दोष स्वतः ही दूर होने लगते हैं।
वास्तु गुरु के अनुसार स्वास्तिक बनाने की सही विधि: किन चीजों का करें इस्तेमाल और क्या है सही दिशा
वास्तु शास्त्र और ज्योतिषीय नियमों के अनुसार घर में स्वास्तिक बनाते समय कुछ खास बातों का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है, तभी इसका पूर्ण और सकारात्मक फल प्राप्त होता है।
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सही सामग्री का चुनाव: स्वास्तिक बनाने के लिए हमेशा शुद्ध कुमकुम, सिंदूर, हल्दी या अष्टगंध का ही प्रयोग करना चाहिए। इन्हें थोड़ा सा गंगाजल या गाय के घी में मिलाकर गाढ़ा घोल तैयार कर लेना चाहिए, कभी भी सूखे पाउडर से स्वास्तिक नहीं बनाना चाहिए।
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तर्जनी उंगली से बचें: वास्तु गुरुओं का सुझाव है कि स्वास्तिक बनाते समय कभी भी अपनी तर्जनी उंगली (Index Finger) का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, बल्कि हमेशा अनामिका उंगली (Ring Finger) या सीधे हाथ की मध्यमा उंगली का उपयोग करना शुभ माना जाता है।
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दिशा और स्थान: घर के मुख्य द्वार (Main Door) के दोनों तरफ या ठीक बीच में सिंदूर या हल्दी से स्वास्तिक बनाना सबसे उत्तम होता है। मुख्य द्वार पर स्वास्तिक बनाते समय यह ध्यान रखें कि उसकी चौड़ाई कम से कम 9 अंगुल होनी चाहिए और वह बिल्कुल सीधा और स्पष्ट बनना चाहिए।
स्वास्तिक बनाते समय भूलकर भी न करें ये गलतियां: जानिए किन नियमों की अनदेखी ला सकती है वास्तु दोष
अक्सर लोग अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिससे पूजा-पाठ और मांगलिक चिह्नों का पूरा फल नहीं मिल पाता है। सबसे पहली बात तो यह है कि कभी भी गंदे हाथों से या गंदी जगह पर स्वास्तिक का निर्माण नहीं करना चाहिए। इसके अलावा, दीवार या दरवाजे पर बना हुआ स्वास्तिक कभी भी कटा-फटा या टेढ़ा-मेढ़ा नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसे वास्तु में अशुभ माना गया है। नवरात्रि के नौ दिनों तक रोजाना सुबह स्नान करने के बाद यदि मुख्य द्वार पर नया स्वास्तिक बनाया जाए या पुराने की ही रोली से पूजा कर ली जाए, तो घर में हमेशा बरकत बनी रहती है। वास्तु गुरुओं का यह भी मानना है कि स्वास्तिक के चारों कोनों में चार बिंदियां जरूर लगानी चाहिए और बीच में चार रेखाएं खींचकर उसकी सही आकृति पूरी करनी चाहिए, क्योंकि ये बिंदियां चारों वेदों और दिशाओं की रक्षा का प्रतीक होती हैं। यदि आप भी इस नवरात्रि इन नियमों का पालन करते हुए अपने घर के मुख्य द्वार पर विधि-विधान से स्वास्तिक बनाते हैं, तो आपके जीवन के सभी कष्ट दूर होंगे और घर में सुख-शांति का वास होगा।