आकिब नबी की संघर्षपूर्ण क्रिकेट यात्रा: जब पिता का नहीं मिला साथ और पड़ोसियों के तानों के बीच जिगरी यार बना मसीहा

आकिब नबी की संघर्षपूर्ण क्रिकेट यात्रा: जब पिता का नहीं मिला साथ और पड़ोसियों के तानों के बीच जिगरी यार बना मसीहा

भारतीय क्रिकेट में अपनी खास जगह बनाने वाले तेज गेंदबाज आकिब नबी (Aaqib Nabi) का यहां तक पहुंचने का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। एक समय ऐसा था जब कश्मीरी आकिब के लिए क्रिकेट खेलना किसी चुनौती से कम नहीं था। उनके रास्ते में न सिर्फ तंज कसते पड़ोसी रुकावट थे, बल्कि परिवार और पिता का सपोर्ट भी नहीं मिल रहा था। ऐसे में उनका एक जिगरी दोस्त उनके जीवन का सबसे बड़ा मसीहा बनकर उभरा, जिसके अथक प्रयासों ने आकिब की किस्मत का ताला खोल दिया।

जब पढ़ाई के दबाव में पिता ने कर दिया था मना

आकिब नबी जब किशोर अवस्था में थे और उन्होंने बीसीसीआई के प्रतिष्ठित तेज गेंदबाजी शिविर में हिस्सा लेने का बुलावा आया, तब वह अपनी 12वीं बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। उनके पिता गुलाम नबी डार एक सरकारी स्कूल में शिक्षक थे और शिक्षा को सबसे सर्वोपरि मानते थे। वह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि उनका बेटा क्रिकेट के चक्कर में अपनी पढ़ाई या मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी दांव पर लगाए। इस शिविर में ऑस्ट्रेलिया के महान तेज गेंदबाज ग्लेन मैकग्रा (Glenn McGrath) जैसे दिग्गज खिलाड़ियों से गेंदबाजी की बारीकियां सीखने का सुनहरा अवसर था, लेकिन पिता की दो टूक मनाही के कारण यह सपना टूटता नजर आ रहा था।

पड़ोसियों की चुभती बातें और बिना स्पाइक्स के शुरुआती दिन

कश्मीर की गलियों से निकलकर क्रिकेट के मैदान तक का यह सफर बिल्कुल आसान नहीं था। स्थानीय स्तर पर पड़ोसियों की ताने भरी निगाहें और हर गतिविधि पर नजर रखना आकिब और उनके परिवार के लिए मानसिक रूप से चुभने वाला था। शुरुआती दिनों की मासूमियत का आलम यह था कि जब आकिब पहली बार क्लब मैच खेलने उतरे तो उन्हें यह तक पता नहीं था कि तेज गेंदबाजी के लिए स्पाइक्स वाले जूतों की जरूरत होती है। वह साधारण जूते पहनकर ही पिच पर उतर गए और पहली ही गेंद पर फिसलकर गिर पड़े। तब दूसरे छोर पर खेल रहे सीनियर खिलाड़ियों ने उन्हें अपने जूते उधार दिए थे।

जिगरी यार जुबैर बने मसीहा, ऐसे बदला पूरा रुख

इस मुश्किल दौर में आकिब के पहले क्लब कप्तान और जिगरी दोस्त जुबैर डार उनके लिए संकटमोचन बनकर आए। जुबैर ने मोर्चा संभाला और आकिब के पिता को यह समझाने में कामयाब रहे कि ग्लेन मैकग्रा के शिविर में जाने का मौका हाथ से जाने देना कितनी बड़ी भूल होगी। जुबैर की जिद और तर्कों के आगे आखिरकार पिता पिघल गए। एक सरकारी शिक्षक होने के बावजूद पिता ने हिम्मत जुटाई, करीब 10,000 रुपये का इंतजाम किया और ट्रेन के बजाय अपने बेटे को पहली बार हवाई जहाज से चेन्नई भेजा। दोस्त के उस एक सही फैसले ने आकिब की जिंदगी की दिशा ही बदल दी।

सपनों को मिली ऊंची उड़ान और रच दिया इतिहास

जिगरी दोस्त के समर्थन और खुद की कड़ी मेहनत के दम पर आकिब नबी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। घरेलू क्रिकेट में लगातार शानदार और धमाकेदार प्रदर्शन करते हुए उन्होंने इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कराया। जम्मू-कश्मीर से ताल्लुक रखने वाले वह पहले ऐसे तेज गेंदबाज बने, जिन्हें भारतीय राष्ट्रीय क्रिकेट टीम (टेस्ट स्क्वाड) में चुना गया। आज जब वह फर्श से अर्श तक के सफर पर पहुंच चुके हैं, तो उनके पुराने दिन और दोस्त जुबैर का साथ हर किसी के लिए मिसाल बन गया है।

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