पीएम मोदी को बधाई देने वाले सपा उम्मीदवार धनराज नाथवानी के समर्थन में उतरी बीजेपी
उत्तर प्रदेश की राजनीति के गलियारों से इस वक्त एक ऐसा दिलचस्प और चौंकाने वाला सियासी घटनाक्रम सामने आया है, जिसने राज्य के राजनीतिक तापमान को अचानक बहुत बढ़ा दिया है। समाजवादी पार्टी (सपा) द्वारा हाल ही में राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाए गए जाने-माने उद्योगपति और कॉरपोरेट जगत की हस्ती धनराज नाथवानी (Dhanraj Nathwani) द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 साल पूरे होने पर खुले तौर पर दी गई बधाई ने तूल पकड़ लिया है। एक तरफ जहां विपक्षी दलों और अन्य राजनीतिक संगठनों ने इस बधाई को लेकर समाजवादी पार्टी और उसके नेतृत्व पर तंज कसना शुरू कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने खुलकर धनराज नाथवानी का समर्थन करते हुए एक बहुत बड़ा बयान दिया है। बीजेपी ने दो टूक शब्दों में कहा है कि नाथवानी ने राजनीति के किसी संकीर्ण दायरे से ऊपर उठकर अपने 'दिल की बात' कही है, और इतना ही नहीं, पार्टी ने यह भी तंज कसा कि दिल ही दिल में तो समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली और प्रशासनिक उपलब्धियों की प्रशंसा करते हैं, बस राजनीतिक मजबूरियों के कारण वे खुलकर यह बात स्वीकार नहीं कर पाते।
क्या है पूरा मामला और क्यों धनराज नाथवानी के एक सोशल मीडिया पोस्ट से मच गया है उत्तर प्रदेश की राजनीति में बवाल
पूरा मामला तब शुरू हुआ जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में बतौर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री 25 वर्ष सफलतापूर्वक पूरे होने पर पूरे देश में जश्न का माहौल था और तमाम हस्तियां उन्हें बधाई दे रही थीं। इसी कड़ी में समाजवादी पार्टी के कोटे से राज्यसभा चुनाव के लिए आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किए गए उद्योगपति धनराज नाथवानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक लंबा-चौड़ा और बेहद सकारात्मक पोस्ट साझा किया। अपने इस संदेश में उन्होंने साल 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में पीएम मोदी के शपथ लेने से लेकर देश के प्रधानमंत्री के रूप में भारत का नेतृत्व करने तक के उनके सफर की जमकर तारीफ की। उन्होंने प्रधानमंत्री के राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पण, दूरदर्शी नेतृत्व और 'सेवा के संकल्प' की सराहना करते हुए उन्हें निरंतर सफलता की शुभकामनाएं दीं। चूंकि नाथवानी को हाल ही में समाजवादी पार्टी ने अपना उच्च सदन का उम्मीदवार बनाया है, इसलिए विपक्षी दलों को बैठे-बिठाए एक बड़ा मुद्दा मिल गया और वे सपा प्रमुख अखिलेश यादव से सवाल पूछने लगे कि क्या यह दोनों दलों के बीच किसी अंदरूनी सियासी खिचड़ी का हिस्सा है।
बीजेपी का तीखा और रणनीतिक पलटवार: कहा- 'नाथवानी ने दिल से सोचा है, दिमाग से नहीं, और अखिलेश की भी मजबूरी है विरोध करना'
जब इस पोस्ट को लेकर राजनीतिक गलियारों में कयासों और बयानों का दौर तेज हुआ, तो भारतीय जनता पार्टी की तरफ से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने में देर नहीं लगी। बीजेपी के वरिष्ठ प्रवक्ताओं और नेताओं ने स्पष्ट रूप से कहा कि धनराज नाथवानी मुख्य रूप से कॉरपोरेट और उद्योग जगत से ताल्लुक रखते हैं और वे पारंपरिक संकीर्ण राजनीति से बाहर के व्यक्ति हैं, इसीलिए उन्होंने एक राष्ट्रनेता के 25 साल के बेदाग और यशस्वी सफर को देखकर अपने दिल की बात पूरी ईमानदारी से कह दी है। बीजेपी नेता ने आगे जोड़ते हुए यह तक कह डाला कि केवल धनराज नाथवानी ही नहीं, बल्कि दिल की गहराइयों से तो समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कड़े परिश्रम और विकास कार्यों की प्रशंसा करते हैं, लेकिन विपक्षी दल की राजनीतिक विवशता और चुनावी नफा-नुकसान के गणित के कारण वे सार्वजनिक रूप से प्रधानमंत्री की तारीफ करने से बचते हैं और मजबूरी में विरोध के स्वर अपनाते हैं। बीजेपी के इस बयान के बाद राज्य की सियासत में बहस और अधिक तीव्र हो गई है।
कॉरपोरेट पृष्ठभूमि के उम्मीदवार और राज्यसभा चुनाव के समीकरण: आने वाले दिनों में क्या पड़ेगा इस विवाद का असर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धनराज नाथवानी जैसे बड़े उद्योगपति और रिलायंस समूह से जुड़े वरिष्ठ प्रशासनिक चेहरे को समाजवादी पार्टी द्वारा राज्यसभा भेजने का फैसला पहले से ही काफी चर्चा में था, क्योंकि वे पारंपरिक समाजवादी पृष्ठभूमि से नहीं आते हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक प्रशंसा करने के बाद यह मामला और अधिक तूल पकड़ चुका है, जहां एक तरफ बहुजन समाज पार्टी (BSP) और एआईएमआईएम (AIMIM) जैसी पार्टियां सपा की नीयत पर सवाल खड़े कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी इस पूरे प्रकरण का राजनीतिक लाभ लेने की फिराक में नजर आ रही है। हालांकि, संख्या बल के हिसाब से उनका निर्वाचन लगभग तय माना जा रहा है, लेकिन इस छोटे से सोशल मीडिया पोस्ट ने यह साबित कर दिया है कि उत्तर प्रदेश के राजनीतिक मंच पर कब और कौन सा बयान भूचाल ले आए, इसका अनुमान लगाना बेहद कठिन है। आगामी विधानसभा चुनावों और राज्य की बदलती राजनीतिक नब्ज के बीच यह विवाद आने वाले दिनों में और भी नए रंग दिखा सकता है।