Prabhat Vaibhav,Digital Desk : पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के बादलों के बीच दक्षिण एशियाई देश श्रीलंका ने एक ऐसा कूटनीतिक फैसला लिया है, जिसने वाशिंगटन से लेकर तेल अवीव तक हलचल मचा दी है। श्रीलंका सरकार ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि वह मध्य पूर्व में जारी खूनी संघर्ष के लिए अपनी जमीन या आसमान का इस्तेमाल नहीं होने देगा। राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से जारी संकेतों के अनुसार, श्रीलंका ने अमेरिकी सैन्य विमानों को अपने हवाई अड्डों पर लैंडिंग की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया है। श्रीलंका का यह कड़ा रुख अमेरिका की युद्ध रणनीतियों के लिए एक बड़ा रणनीतिक अवरोध माना जा रहा है।
तटस्थता की नीति और संप्रभुता का हवाला
श्रीलंका के विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि देश की नीति हमेशा से शांति और गुटनिरपेक्षता की रही है। कोलंबो ने स्पष्ट किया है कि वे किसी भी ऐसे सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं बनेंगे जो क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ावा देता हो। अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद, श्रीलंका ने अपनी संप्रभुता को सर्वोपरि रखते हुए यह फैसला लिया है। जानकारों का मानना है कि श्रीलंका का यह कदम अरब देशों और ईरान के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को सुरक्षित रखने की एक सोची-समझी रणनीति है। अमेरिका लंबे समय से हिंद महासागर में अपनी सैन्य रसद (Logistics) के लिए श्रीलंका जैसे रणनीतिक ठिकानों पर नजर गड़ाए हुए था, जिस पर अब पानी फिरता नजर आ रहा है।
अमेरिका की हिंद महासागर रणनीति को लगा तगड़ा धक्का
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिका अपने विमानों और रसद को तेजी से तैनात करने की योजना बना रहा है। श्रीलंका द्वारा लैंडिंग की अनुमति न दिए जाने से अमेरिकी वायुसेना को अब वैकल्पिक और लंबे रास्तों का सहारा लेना होगा। इससे न केवल समय की बर्बादी होगी, बल्कि परिचालन लागत (Operational Cost) में भी भारी इजाफा होगा। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि श्रीलंका का यह 'ना' अमेरिका के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि हिंद महासागर में श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। कोलंबो के इस फैसले को वैश्विक पटल पर अमेरिका के घटते प्रभाव के रूप में भी देखा जा रहा है।
क्या दबाव में है श्रीलंका? कूटनीतिक गलियारों में चर्चा तेज
श्रीलंका के इस साहसी फैसले के बाद कूटनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा तेज है कि क्या इसके पीछे कोई वैश्विक दबाव है। चूंकि श्रीलंका की आर्थिक स्थिति अभी पटरी पर लौट रही है, इसलिए वाशिंगटन के अधिकारी इस फैसले को गंभीरता से देख रहे हैं। हालांकि, श्रीलंका ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि यह निर्णय पूरी तरह से राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय आधार पर लिया गया है। अब देखना यह होगा कि श्रीलंका के इस इनकार के बाद जो बाइडन प्रशासन का अगला कदम क्या होता है और क्या अमेरिका कोलंबो पर कूटनीतिक दबाव बनाने की कोशिश करेगा।
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