अमेरिकी कूटनीति की बड़ी रणनीतिक चूकों ने दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर ला खड़ा किया

अमेरिकी कूटनीति की बड़ी रणनीतिक चूकों ने दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर ला खड़ा किया

आज की तारीख में यदि वैश्विक पटल पर नजर दौड़ाई जाए तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे पूरी दुनिया किसी बहुत बड़े और खतरनाक ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठी है, जो कभी भी फट सकता है। एक तरफ जहां पश्चिम एशिया यानी मिडिल ईस्ट की धरती पर इजराइल, ईरान, लेबनान और गाजा के बीच चल रहा खूनी संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा है और हर गुजरते दिन के साथ उसके दायरे बढ़ते जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ यूरोप के कोने में रूस और यूक्रेन के बीच महायुद्ध का दायरा भी लगातार खतरनाक रूप लेता जा रहा है। इन दोनों ही महा-संघर्षों के केंद्र में यदि किसी एक वैश्विक ताकत की नीतियों पर सबसे बड़े सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं, तो वह संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और उसकी विदेश नीति है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों और वैश्विक मामलों के विशेषज्ञों का अब यह मानना है कि अमेरिकी प्रशासन की रणनीतिक चूकों, कमजोर नेतृत्व और दोहरी नीतियों के कारण ही आज दुनिया के ये दोनों सबसे संवेदनशील क्षेत्र अनियंत्रित अराजकता की आग में झुलस रहे हैं। आइए इस विस्तृत और गहन विश्लेषण के जरिए यह समझने की कोशिश करते हैं कि अमेरिका की किन गलतियों ने वैश्विक सुरक्षा को इस हद तक खतरे में डाल दिया है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही वैश्विक सुपरपावर होने का दावा करने वाला अमेरिका हमेशा से यह कहता आया है कि वह दुनिया भर में शांति और लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से अमेरिका के रणनीतिक फैसले उल्टे पड़े हैं और दुनिया के दो सबसे बड़े हिस्सों में भीषण युद्ध छिड़े हैं, उसने सुपरपावर के रूप में अमेरिका की साख को गहरा धक्का पहुंचाया है। आइए इस पूरे भू-राजनीतिक संकट की एक-एक परत को बेहद गहराई से टटोलते हैं और देखते हैं कि पश्चिम एशिया की सुलगती आग और यूक्रेन की बर्बादी के पीछे अमेरिकी कूटनीति का कौन सा काला सच छुपा हुआ है।

पश्चिम एशिया में फैलता बारूद का ढेर: कैसे अमेरिकी पक्षपात और गलत फैसलों ने मध्य पूर्व को झुलसाया?

पश्चिम एशिया में जारी मौजूदा संकट कोई रातों-रात पैदा हुई स्थिति नहीं है, बल्कि यह दशकों से चली आ रही उस नीति का परिणाम है जिसे अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों ने एकतरफा तरीके से चलाया। जब भी इजराइल और फिलिस्तीन या उसके पड़ोसी अरब देशों के बीच तनाव बढ़ा, अमेरिका ने हमेशा निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बजाय इजराइल को बिना शर्त सैन्य और कूटनीतिक समर्थन देना जारी रखा। कूटनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि अमेरिका ने शुरुआत से ही द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (Two-State Solution) को लागू करवाने के लिए ईमानदारी से दबाव बनाया होता, तो आज गाजा की पट्टियों से लेकर बेरूत की सड़कों तक मासूमों का खून न बह रहा होता।

इसके अलावा, ईरान के साथ ऐतिहासिक परमाणु समझौते (JCPOA) से अचानक एकतरफा तरीके से पीछे हटने का डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का फैसला पश्चिम एशिया के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। इस एक फैसले ने ईरान को और अधिक उग्र होने का मौका दिया और उसने अपने प्रॉक्सी नेटवर्क्स (हमास, हिजबुल्लाह और हूती विद्रोहियों) के जरिए पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैला दी। बाइडन प्रशासन के दौरान भी इस नीति में कोई ठोस बदलाव नहीं आया, और अमेरिका केवल कागजी बयानों तक सीमित रहा। जब यमन के हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाना शुरू किया, तब भी अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप की नीति इस संकट को रोकने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई। आज स्थिति यह है कि पूरा पश्चिम एशिया एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस चुका है जहां हर देश दूसरे को नेस्तनाबूद करने पर आमादा है, और अमेरिका केवल मूकदर्शक बनकर अपनी रणनीतिक विफलता को देख रहा है।

यूक्रेन-रूस युद्ध और नाटो का विस्तार: मास्को को उकसाने में अमेरिका की बड़ी कूटनीतिक भूल

पश्चिम एशिया के उथल-पुथल भरे माहौल से ठीक विपरीत, यूरोप के महाद्वीप पर रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध भी अमेरिकी आधिपत्य और उसकी नाटो (NATO) विस्तारवादी नीतियों का सीधा परिणाम है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन लंबे समय से यह चेतावनी देते आ रहे थे कि यूक्रेन को नाटो संगठन में शामिल करने की पश्चिमी देशों की जिद रूस की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक 'रेड लाइन' है। इसके बावजूद, अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों ने लगातार कीव को सैन्य और आर्थिक रूप से उकसाया तथा यूक्रेन को रूस के खिलाफ एक प्रॉक्सी जंग लड़ने के मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया।

जब फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर सैन्य आक्रमण किया, तो अमेरिका को यह उम्मीद थी कि उसके द्वारा लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों (Economic Sanctions) के कारण कुछ ही हफ्तों में रूसी अर्थव्यवस्था ढह जाएगी और पुतिन घुटने टेक देंगे। लेकिन अमेरिकी रणनीतिकारों का यह आकलन पूरी तरह गलत साबित हुआ। इसके विपरीत, रूस ने चीन, भारत और अन्य एशियाई देशों के साथ अपने व्यापारिक संबंध मजबूत कर लिए, जिससे अमेरिकी प्रतिबंधों की हवा निकल गई। आज यूक्रेन खंडहर में तब्दील हो चुका है, लाखों लोग शरणार्थी बन चुके हैं, और इस सबके बावजूद अमेरिका युद्ध को रोकने के लिए कोई सार्थक कूटनीतिक पहल करने के बजाय लगातार हथियारों की सप्लाई बढ़ा रहा है, जिससे परमाणु युद्ध का खतरा हर दिन मंडरा रहा है।

अमेरिकी दोहरी नीति और ग्लोबल साउथ का बदलता रुख: अब अमेरिका पर भरोसा नहीं कर रही दुनिया

इन दोनों मोर्चों पर अमेरिका की विफलता ने ग्लोबल साउथ (Global South) यानी विकासशील देशों की आंखें खोल दी हैं। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देश अब यह साफ तौर पर देख पा रहे हैं कि अमेरिका अपने भू-राजनीतिक हितों को साधने के लिए दुनिया के किसी भी देश को आग में झोंक सकता है। जब बात यूक्रेन की होती है, तो अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता की बात करता है, लेकिन जब पश्चिम एशिया में इजराइल द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं, तो अमेरिका आंखें मूंद लेता है। इस दोहरे चरित्र ने वैश्विक मंच पर अमेरिका की नैतिक ताकत को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है।

आज दुनिया के कई देश अमेरिका पर आंख मूंदकर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं। ब्रिक्स (BRICS) जैसे संगठन तेजी से उभर रहे हैं जो अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं और एक बहुध्रुवीय (Multipolary) दुनिया की वकालत कर रहे हैं। अमेरिका की यह रणनीतिक चूक न केवल उसकी वैश्विक महाशक्ति की स्थिति को कमजोर कर रही है, बल्कि दुनिया को एक नए शीत युद्ध या उससे भी भयानक तबाही की ओर धकेल रही है।

क्या दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध से बचाने के लिए कोई रास्ता बचा है?

सवाल यह उठता है कि क्या इन विकट परिस्थितियों से निकलने का कोई कूटनीतिक रास्ता शेष है? विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अमेरिका और पश्चिमी देश अपनी 'हस्तक्षेप और वर्चस्व' वाली पुरानी मानसिकता को नहीं छोड़ते, तब तक दुनिया में शांति स्थापित होना असंभव है। रूस-यूक्रेन युद्ध को रोकने के लिए तत्काल प्रभाव से युद्धविराम और निष्पक्ष शांति वार्ताओं की जरूरत है, जिसमें रूस की सुरक्षा चिताओं को भी प्राथमिकता दी जाए। इसी तरह, पश्चिम एशिया में स्थायी शांति तभी आ सकती है जब फिलिस्तीन के अधिकारों का सम्मान करते हुए एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के गठन पर ईमानदारी से काम किया जाए।