UNSC सुधारों पर संयुक्त राष्ट्र प्रमुख के बयान से इस्लामाबाद में मचा हड़कंप
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, वैश्विक राजनीति और संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations) के गलियारों से इस वक्त एक ऐसी भूचाल लाने वाली और बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है, जिसने पाकिस्तान की सरकार और उसके हुक्मरानों के होश उड़ा दिए हैं। संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष नेतृत्व और प्रमुख अधिकारियों की तरफ से सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधारों और विस्तार को लेकर एक ऐसा स्पष्ट बयान सामने आया है, जिसने सीधे तौर पर भारत के उस दीर्घकालिक और मजबूत रुख का समर्थन कर दिया है, जिसके तहत नई दिल्ली लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की दावेदारी पेश करती आ रही है। इस अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम के बाद से इस्लामाबाद के राजनीतिक गलियारों और कूटनीतिक खेमे में भारी सन्नाटा और सदमे का माहौल है, क्योंकि पाकिस्तान दशकों से भारत को वैश्विक मंच पर इस तरह की बड़ी कूटनीतिक बढ़त मिलने से रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाता रहा है। यूएन प्रमुख के इस अप्रत्याशित और संतुलित रुख ने वैश्विक मंच पर एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आधुनिक दुनिया की बदलती वास्तविकताओं को स्वीकार करते हुए भारत जैसे सबसे बड़े लोकतंत्र को वैश्विक प्रशासनिक ढांचे के केंद्र में लाना अब दुनिया की अनिवार्य जरूरत बन चुका है। आइए विस्तार से जानते हैं इस पूरी कूटनीतिक हलचल और पाकिस्तान के सदमे के पीछे की असली वजह के बारे में।
क्या है संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) सुधारों का पूरा मामला और क्यों भारत की दावेदारी को माना जा रहा है सबसे मजबूत
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1945 में स्थापित की गई संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की संरचना आज की 21वीं सदी की भू-राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताओं से कोसों दूर हो चुकी है, जिसमें केवल पांच देश (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन) वीटो पावर के साथ स्थायी सदस्य के रूप में काबिज हैं। भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश, पांचवीं सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति और वैश्विक शांति सेना में सबसे बड़ा योगदान देने वाला राष्ट्र होने के नाते लगातार यह तर्क देता रहा है कि संयुक्त राष्ट्र को अधिक लोकतांत्रिक, समावेशी और प्रतिनिधिमूलक बनाने के लिए इसके सुरक्षा परिषद का विस्तार किया जाना बेहद आवश्यक है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष स्तर पर हुई उच्चस्तरीय बैठकों और चर्चाओं के दौरान जब वैश्विक मंच पर सुरक्षा परिषद में सुधारों की बात उठी, तो यूएन प्रमुख और विभिन्न सदस्य देशों के प्रतिनिधियों ने भारत की इस मांग और उसके तर्कों को पूरी तरह से तार्किक तथा समय की मांग के अनुकूल करार दिया। इसी खुली ताईद को पाकिस्तान अपने लिए एक बहुत बड़ा कूटनीतिक झटका और राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ मान बैठा है।
पाकिस्तान की बौखलाहट और सदमे की मुख्य वजह: क्यों भारत की वैश्विक जीत को पचा नहीं पा रहा है इस्लामाबाद
पाकिस्तान की विदेश नीति का एक सूत्रीय एजेंडा पिछले कई दशकों से केवल यही रहा है कि किसी भी तरह से भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में कोई भी बड़ा पद या स्थायी सदस्यता हासिल न होने पाए। इसके लिए पाकिस्तान लगातार कश्मीर राग अलापने के साथ-साथ भारत की बढ़ती वैश्विक साख के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने में जुटा रहता है। लेकिन जब संयुक्त राष्ट्र प्रमुख के कार्यालय या उनके ब बयानों से यह स्पष्ट संकेत मिला कि दुनिया अब भारत के बढ़ते आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक कद को नजरअंदाज नहीं कर सकती, तो पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय और वहां की मीडिया में भूचाल आ गया। इस्लामाबाद के हुक्मरानों को यह डर सता रहा है कि यदि वैश्विक समुदाय ने भारत को वीटो पावर के साथ सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बना दिया, तो दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में पाकिस्तान पूरी तरह से प्रासंगिकता खो देगा और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी किसी भी बात को कोई तवज्जो नहीं मिलेगी।
वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज बन चुका है भारत: भविष्य के अंतरराष्ट्रीय समीकरणों पर क्या होगा इसका प्रभाव
आज का भारत केवल दक्षिण एशिया का एक क्षेत्रीय देश नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ (Global South) यानी विकासशील और गरीब देशों की एक मजबूत और मुखर आवाज बनकर दुनिया के सामने उभरा है। चाहे जलवायु परिवर्तन का मुद्दा हो, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को स्थिर रखना हो, या फिर आपदा राहत और आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहिष्णुता की नीति हो, भारत ने हर मोर्चे पर अपनी वैश्विक जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। यही कारण है कि अमेरिका, फ्रांस और रूस जैसे देश पहले ही खुले तौर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर चुके हैं, और अब संयुक्त राष्ट्र प्रमुख के स्तर से भी इस दिशा में सकारात्मक संकेत मिलने का मतलब है कि दुनिया का बहुमत अब बदलाव के पक्ष में खड़ा है। पाकिस्तान की लाख कोशिशों और विरोध के बावजूद वैश्विक कूटनीति का यह ऊंट किस करवट बैठ रहा है, यह इस बात का प्रमाण है कि योग्यता, लोकतंत्र और वैश्विक शांति के पैमानों पर भारत की दावेदारी अब अकाट्य हो चुकी है, और इस्लामाबाद के सदमे से इस ऐतिहासिक सच्चाई को बदला नहीं जा सकता।