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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने लुधियाना के दोराहा में साल 2019 में हुई एक साढ़े सात साल की बच्ची से दरिंदगी और उसकी हत्या के मामले में बड़ा मोड़ ला दिया है। हाई कोर्ट ने इस मामले में दोषी करार दिए गए दो आरोपितों को निचली अदालत द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही में 'गंभीर प्रक्रियात्मक खामियां' पाते हुए मामले को दोबारा सेशन कोर्ट भेजने का आदेश दिया है।

क्यों रद्द हुई फांसी की सजा?

जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने पाया कि ट्रायल के दौरान कानूनी प्रक्रियाओं का सही ढंग से पालन नहीं किया गया था। कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां इस प्रकार रहीं:

अस्पष्ट सवाल: आरोपितों से पूछताछ के दौरान पूछे गए सवाल गलत और अस्पष्ट थे।

साक्ष्यों की अनदेखी: दुष्कर्म से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण मेडिकल साक्ष्य आरोपितों के सामने रखे ही नहीं गए, जिससे उन्हें अपनी सफाई देने का उचित अवसर नहीं मिला।

मौलिक अधिकार का हनन: अदालत ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 313 के तहत आरोपित का बयान दर्ज करना महज एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह उसे अपने खिलाफ सबूतों पर स्पष्टीकरण देने का एक मौलिक अधिकार देता है।

[Symbol of Justice - Gavel and Scales of Justice for legal representation]

क्या था पूरा मामला?

घटना: 9 मार्च 2019 की शाम, लुधियाना के दोराहा में आरोपित विनोद शाह एक साढ़े सात साल की बच्ची को टॉफी दिलाने के बहाने ले गया था।

अपराध: बाद में दूसरा आरोपित रोहित शर्मा भी उसके साथ जुड़ गया। आरोप है कि दोनों ने बच्ची को सुनसान गोदाम में ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म किया और फिर गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी।

सबूत: उसी रात बच्ची का शव बरामद हुआ और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दुष्कर्म व गला घोंटने की पुष्टि हुई। निचली अदालत ने इन साक्ष्यों के आधार पर दोनों को मौत की सजा सुनाई थी।

अब आगे क्या होगा?

हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब यह मामला वापस सेशन कोर्ट (लुधियाना) जाएगा।

दोबारा बयान: आरोपितों के बयान नए सिरे से दर्ज किए जाएंगे।

फिर से ट्रायल: ट्रायल उसी चरण से पुन: शुरू होगा जहां प्रक्रियात्मक चूक हुई थी।

कस्टडी: फांसी की सजा रद्द होने के बावजूद आरोपितों को रिहा नहीं किया जाएगा; वे न्यायिक हिरासत में ही रहेंगे।

लंबित अपील: हत्या संदर्भ (मर्डर रेफरेंस) और दोषियों की अपीलें अंतिम निर्णय आने तक हाई कोर्ट में लंबित रहेंगी।

अदालत का यह फैसला स्पष्ट करता है कि न्याय की प्रक्रिया में सजा जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी उस सजा तक पहुँचने वाली कानूनी प्रक्रिया की पारदर्शिता और शुद्धता है।