Prabhat Vaibhav, Digital Desk : मध्य पूर्व (Middle East) में जारी बारूदी तनाव के बीच एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ अचानक ईरान की राजधानी तेहरान पहुंच गए हैं। कूटनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जनरल मुनीर के हाथ में वाशिंगटन का एक 'विशेष पत्र' है, जो अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की आग को ठंडा कर सकता है।
पाकिस्तान बना 'शांति दूत': इस्लामाबाद में होगी वार्ता 2.0?
दुनिया भर की निगाहें इस समय पाकिस्तान की भूमिका पर टिकी हैं। प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ के निर्देश पर जनरल मुनीर अमेरिका और ईरान के बीच 'मुख्य मध्यस्थ' (Chief Mediator) की भूमिका निभा रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि इस यात्रा का एकमात्र उद्देश्य दोनों देशों को फिर से बातचीत की मेज पर लाना है। खबर है कि यदि तेहरान में बातचीत सफल रही, तो वार्ता का दूसरा दौर यानी 'टॉक 2.0' जल्द ही पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित किया जा सकता है।
ट्रंप के संकेत और सीक्रेट कूटनीति का खेल
ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार, पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल अमेरिका का एक संवेदनशील संदेश लेकर आया है। वहीं, दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी संकेत दिए हैं कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान की धरती पर एक बड़ी कूटनीतिक बैठक हो सकती है। हालांकि, व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि अभी तक किसी औपचारिक युद्धविराम पर सहमति नहीं बनी है, लेकिन पर्दे के पीछे 'गुप्त वार्ता' (Secret Talks) का सिलसिला काफी तेज हो गया है।
युद्धविराम पर अब भी बना है संशय
भले ही पाकिस्तान एक बड़े राजनयिक अवसर के रूप में इस मौके को भुनाने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन जमीन पर स्थिति अब भी नाजुक है। वाशिंगटन ने फिलहाल युद्धविराम की समयसीमा बढ़ाने पर कोई आधिकारिक मुहर नहीं लगाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक इस्लामाबाद में होने वाली प्रस्तावित बैठक का एजेंडा तय नहीं हो जाता, तब तक खाड़ी क्षेत्र में युद्ध के नगाड़े बजते रहेंगे।
पाकिस्तान के लिए क्यों अहम है यह मध्यस्थता?
पाकिस्तान इस समय अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि को सुधारने और वैश्विक कूटनीति में अपनी प्रासंगिकता साबित करने की कोशिश कर रहा है। यदि जनरल मुनीर ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने में सफल होते हैं, तो यह पाकिस्तान के लिए दशकों की सबसे बड़ी राजनयिक जीत होगी। लेकिन सवाल वही है—क्या तेहरान और वाशिंगटन एक-दूसरे पर भरोसा करेंगे? पूरा क्षेत्र फिलहाल 'रुको और देखो' की स्थिति में है।
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