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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : आचार्य चाणक्य की नीतियां न केवल राजनीति और अर्थशास्त्र, बल्कि सुखी वैवाहिक और सामाजिक जीवन का भी आधार हैं। 'चाणक्य नीति' में ऐसी कई चेतावनियां दी गई हैं, जिनका पालन न करने पर व्यक्ति को अपमान और संकट का सामना करना पड़ सकता है। आचार्य चाणक्य ने विशेष रूप से चार ऐसी स्थितियों का वर्णन किया है, जहां किसी भी बाहरी व्यक्ति का हस्तक्षेप 'घातक' परिणाम ला सकता है।

1. पति-पत्नी के निजी विवाद: भूलकर भी न बोलें बीच में

चाणक्य के अनुसार, पति-पत्नी का रिश्ता एक बंद कमरे की तरह होता है। उनके बीच चाहे कितनी भी कड़वाहट या झगड़ा क्यों न हो, किसी तीसरे व्यक्ति को टांग नहीं अड़ानी चाहिए। आचार्य कहते हैं कि पति-पत्नी का झगड़ा क्षणिक होता है और वे जल्द ही फिर से एक हो जाते हैं, लेकिन बीच में बोलने वाला व्यक्ति दोनों की नजरों में बुरा बन जाता है। इससे आपके स्वयं के रिश्ते उनसे खराब हो सकते हैं।

2. बुद्धिमानों की सभा: मौन रहने में ही भलाई

जब दो ज्ञानी या बुद्धिमान व्यक्ति किसी गंभीर विषय पर चर्चा कर रहे हों, तो वहां बिना मांगे अपनी राय देना मूर्खता की श्रेणी में आता है। यदि आपको उस विषय का पूर्ण ज्ञान नहीं है और आप हस्तक्षेप करते हैं, तो आप न केवल अपनी छवि धूमिल करेंगे बल्कि उपहास के पात्र भी बनेंगे। ऐसी स्थिति में केवल सुनना और सीखना ही श्रेष्ठ है।

3. पुजारी और हवन: न डालें आध्यात्मिक कार्य में बाधा

शास्त्रों और चाणक्य नीति के अनुसार, जब कोई ब्राह्मण या पुजारी हवन और अनुष्ठान कर रहा हो, तो उसके मार्ग में आना या बीच में टोकना वर्जित है। हवन एक पवित्र प्रक्रिया है, जिसमें एकाग्रता की आवश्यकता होती है। यदि आपके हस्तक्षेप से अनुष्ठान बाधित होता है, तो यह धार्मिक दृष्टि से अशुभ माना जाता है और आपको विद्वान ब्राह्मण के क्रोध का भागी बनना पड़ सकता है।

4. पशु-पक्षियों का झुंड: मोल न लें जान का जोखिम

आचार्य चाणक्य ने व्यावहारिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह सलाह दी है कि जब जानवर या पक्षी झुंड में हों, तो उनके बीच से निकलने या उन्हें परेशान करने की कोशिश न करें। ऐसा करना उन्हें उग्र बना सकता है। जानवरों का हमला आपके जीवन और संपत्ति के लिए बड़ा खतरा पैदा कर सकता है। प्रकृति के इन मूक प्राणियों के अनुशासन में खलल डालना स्वयं को मुसीबत में डालना है।