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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : उत्तराखंड कांग्रेस के भीतर अंदरूनी कलह एक बार फिर सतह पर आ गई है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद डॉ. महेंद्र पाल ने रामनगर के बागी नेताओं की कांग्रेस में वापसी की पैरवी करने वालों के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। डॉ. पाल ने अपनी वफादारी और पार्टी निष्ठा का हवाला देते हुए उन नेताओं पर सवाल उठाए हैं जो चुनाव के वक्त पार्टी को नुकसान पहुँचाने वालों के लिए 'लाल कालीन' बिछा रहे हैं। इस बयानबाजी ने कुमाऊं की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है।

'तब उम्मीदवारी वापस क्यों नहीं करवाई?': डॉ. पाल का तीखा तंज

बुधवार को जारी एक कड़े बयान में डॉ. महेंद्र पाल ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और पिछले विधानसभा चुनाव में रामनगर से निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले संजय नेगी का नाम लिए बिना उन पर जमकर हमला बोला। उन्होंने सवाल किया कि जो लोग आज बागियों की वापसी के लिए हायतौबा मचा रहे हैं, उन्होंने विधानसभा चुनाव के दौरान बागी प्रत्याशी को कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार के पक्ष में बैठने के लिए क्यों नहीं मनाया? डॉ. पाल ने कहा कि यदि उस समय बगावत न हुई होती, तो वह आज विधानसभा में होते।

हार का दर्द: नामांकन से दो दिन पहले मिला था टिकट

डॉ. पाल ने पिछले विधानसभा चुनाव की याद दिलाते हुए कहा कि उन्हें नामांकन से महज दो दिन पहले रामनगर से प्रत्याशी बनाया गया था। इसके बावजूद उन्होंने और ईमानदार कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पूरी निष्ठा से चुनाव लड़ा। वह जीत के बेहद करीब पहुँचकर भी बहुत कम अंतर से चुनाव हार गए, जिसका मुख्य कारण पार्टी के भीतर से हुई बगावत थी।

निष्ठा बनाम बगावत: 'टिकट न मिलने पर भी कभी नहीं छोड़ी पार्टी'

अपनी वफादारी पर जोर देते हुए पूर्व सांसद ने कहा कि वह साल 2003 में नैनीताल लोकसभा उपचुनाव में 1.25 लाख वोटों से जीते थे। तब से लेकर आज तक उन्होंने हर लोकसभा और विधानसभा चुनाव में टिकट के लिए आवेदन किया, लेकिन टिकट न मिलने पर भी कभी बगावत का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने कहा कि समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर बागियों को तवज्जो देना पार्टी के लिए घातक हो सकता है।

पार्टी हाईकमान के कुछ फैसलों का किया स्वागत

भले ही डॉ. पाल रामनगर के बागियों की वापसी के खिलाफ हों, लेकिन उन्होंने हाल ही में दो पूर्व विधायकों और अन्य नेताओं को पार्टी में शामिल करने के प्रदेश कांग्रेस और हाईकमान के निर्णय का स्वागत किया है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर बागियों के बढ़ते रसूख और उनकी वापसी की कोशिशों ने पार्टी के भीतर खेमेबाजी को और तेज कर दिया है, जिससे आगामी चुनावों में कांग्रेस की डगर कठिन हो सकती है।