Prabhat Vaibhav,Digital Desk : उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत अपनी बेबाकी और सोशल मीडिया पर अनूठे अंदाज के लिए जाने जाते हैं। शनिवार को उनकी एक फेसबुक पोस्ट ने प्रदेश की सियासत में हलचल मचा दी है। रावत ने खुद को 'उज्याडू बल्द' (फसल बर्बाद करने वाला बैल) स्वीकार करते हुए भाजपा नेता दिनेश अग्रवाल पर करारा हमला बोला। उन्होंने साल 2012 के मंत्रिमंडल गठन के उस 'सच' को उजागर किया, जिसने कांग्रेस के भीतर समीकरण बदल दिए थे।
'बुरा देखन मैं चला...' के साथ शुरू हुआ वार
हरीश रावत ने अपनी पोस्ट की शुरुआत कबीर के दोहे से की। उन्होंने लिखा कि दिनेश अग्रवाल द्वारा उन्हें 'उज्याडू बल्द' कहे जाने पर उन्हें आभास हुआ कि अग्रवाल सही कह रहे हैं। रावत ने स्वीकार किया कि 2012 में मंत्रिमंडल गठन के समय उन्होंने वास्तव में एक 'उज्याडू बल्द' की भूमिका निभाई थी, जिसके दूरगामी परिणाम पार्टी को भुगतने पड़े।
2012 का वो फैसला और मयूख महर की अनदेखी
रावत ने खुलासा किया कि 2012 में पिथौरागढ़ के विधायक मयूख महर का हक कैबिनेट मंत्री बनने का था। लेकिन उन्होंने खुद पार्टी से आग्रह किया था कि मयूख उनकी बात मान लेंगे और उन्हें योजना आयोग का अध्यक्ष बनाया जाए। रावत के दबाव में मयूख महर के स्थान पर दिनेश अग्रवाल को कैबिनेट मंत्री बनाया गया। रावत ने अब माना कि उनके उस फैसले ने कांग्रेस के भीतर असंतुलन पैदा किया।
दिनेश अग्रवाल का कांग्रेस छोड़ना और भाजपा में 'प्रासंगिकता'
पूर्व सीएम ने दिनेश अग्रवाल के पाला बदलने पर तंज कसते हुए कहा कि उनके उस गलत फैसले का नतीजा 2024 में दिखा, जब अग्रवाल ने दशकों पुराने कांग्रेस के साथ संबंध तोड़ दिए। रावत ने चुटकी लेते हुए कहा:
"मुझे खुशी है कि मेरे कारण ही सही, मेरे कुछ दोस्त भाजपा में 'प्रासंगिक' बने हुए हैं। जब भी भाजपा को मेरे खिलाफ कुछ कहलवाना होता है, तो वह इन्हीं दोस्तों का इस्तेमाल करती है।"
'मोथरोवाला' कनेक्शन और सियासी हार
रावत ने दिनेश अग्रवाल के कांग्रेस छोड़ने के पीछे 'मोथरोवाला' (देहरादून का एक क्षेत्र) के योगदान का जिक्र करते हुए कहा कि अगर वह मंत्री न बनते, न मोथरोवाला होता और न उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ती। रावत ने आत्ममंथन करते हुए कहा कि उनके उस समय के निर्णयों ने न केवल पिथौरागढ़ में पार्टी को कमजोर किया, बल्कि भविष्य में दल-बदल की नींव भी रखी।
सोशल मीडिया पर छाई पोस्ट
भले ही हरीश रावत इन दिनों अवकाश पर बताए जा रहे हैं, लेकिन उनकी इस 'सेल्फ-डिक्लेयर्ड' पोस्ट ने उत्तराखंड भाजपा और कांग्रेस दोनों ही खेमों में चर्चा छेड़ दी है। राजनीतिक गलियारों में इसे रावत का एक तीर से दो निशाने माना जा रहा है—एक तरफ अपनी पुरानी गलती स्वीकारना और दूसरी तरफ दलबदलुओं को आईना दिखाना।




