Prabhat Vaibhav,Digital Desk : वास्तु के अनुसार, घर की चारों दिशाओं का अलग-अलग प्रभाव होता है। सही दिशा से प्रवेश करने पर स्वास्थ्य और प्रगति प्राप्त होती है, जबकि गलत दिशा से प्रवेश करने पर तनाव और नकारात्मक ऊर्जा बढ़ सकती है।
वास्तु शास्त्र के अनुसार दक्षिण दिशा का महत्व - वास्तु शास्त्र के अनुसार, मुख्य द्वार का दक्षिण दिशा में होना आमतौर पर अशुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिशा से नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करती है, जिससे घर में तनाव, बीमारी और आर्थिक समस्याएं बढ़ सकती हैं। हालांकि, उचित वास्तु उपायों को अपनाकर इसके बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है।
सकारात्मक ऊर्जा पूर्व दिशा से आती है - पूर्व दिशा को सूर्य की दिशा माना जाता है, इसलिए इस दिशा में प्रवेश करना बहुत शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह घर में सकारात्मक ऊर्जा, अच्छे स्वास्थ्य और मन की शांति लाती है। यह दिशा सामाजिक सम्मान और उन्नति के अवसरों को भी बढ़ाती है।
उत्तर दिशा को धन और समृद्धि की दिशा माना जाता है। वास्तु शास्त्र में उत्तर दिशा को धन के देवता कुबेर की दिशा माना जाता है। इस दिशा में मुख्य द्वार होने से आर्थिक शक्ति, नए अवसर और करियर में उन्नति मिलती है। विशेषकर जब द्वार सही स्थान और आकार में हो, तो इसका प्रभाव और भी शुभ हो जाता है।
मुख्य द्वार के लिए महत्वपूर्ण वास्तु सावधानियां: वास्तु के अनुसार, मुख्य द्वार मजबूत, स्वच्छ और आकर्षक होना चाहिए, क्योंकि यहीं से ऊर्जा का प्रवेश होता है। टूटा हुआ या गंदा द्वार नकारात्मक ऊर्जा बढ़ाता है, जबकि पर्याप्त रोशनी, शुभ चिन्ह और नामपट्टियां सकारात्मकता बनाए रखती हैं। इसके अलावा, प्रवेश द्वार के सामने अंधेरा या कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए।
मुख्य द्वार की यह दिशा शुभ नहीं मानी जाती - वास्तु शास्त्र के अनुसार, दक्षिण-दक्षिण-पश्चिम से दक्षिण-पश्चिम की ओर बना मुख्य द्वार सबसे हानिकारक माना जाता है, विशेषकर जब यह गलत स्थिति में हो (दक्षिण-6 से पश्चिम-1)। ऐसी स्थिति में, यह व्यक्ति की सोचने की क्षमता को कमजोर कर सकता है और कर्ज, रिश्तों में असुरक्षा और आर्थिक संकट जैसी समस्याओं को बढ़ा सकता है। कई मामलों में, अचानक बीमारी या दुर्घटना की संभावना भी बढ़ जाती है, और यहां तक कि सामान्य वास्तु उपाय भी बहुत प्रभावी नहीं होते।




