Prabhat Vaibhav,Digital Desk : उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में इस जनवरी माह में हुई भारी और लगातार बर्फबारी से मौसमी ग्लेशियर बनने की उम्मीद जगी है। विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों के अनुसार, यदि अगले कुछ दिनों में एक-दो और हिमपात होते हैं, तो ऊँचाई वाले क्षेत्रों में सीजनल ग्लेशियर विकसित हो सकते हैं।
मुनस्यारी और धारचूला के उच्च हिमालयी भूभाग में पंचाचूली शृंखला, दारमा, व्यास और मल्ला जोहार घाटियों में बर्फ की मोटी परत जमी है। लंबे समय तक तापमान शून्य से नीचे रहने से बर्फ का धीरे-धीरे पिघलना जारी है, जिससे ग्लेशियर बनने की स्थिति अनुकूल है।
स्थानीय जानकार बताते हैं कि ऐसे ग्लेशियर गर्मियों में धीरे-धीरे पिघलते हैं, जिससे उच्च हिमालय से बहने वाली नदियों और प्राकृतिक जल स्रोतों में निरंतर पानी मिलता रहता है। इसका सीधा लाभ गोरी गंगा, काली नदी और उनकी सहायक नदियों को मिलेगा, जिससे पेयजल, सिंचाई और जल विद्युत परियोजनाओं के लिए पानी की उपलब्धता बेहतर होगी।
कृषि और बागवानी के लिहाज से भी यह स्थिति शुभ संकेत है। मुनस्यारी, दारमा और आसपास के क्षेत्रों में सेब, राजमा और अन्य नकदी फसलों के लिए पर्याप्त नमी मिलने की संभावना है। वहीं, गर्मियों में जल संकट से जूझने वाले गांवों को भी राहत मिल सकती है।
हालांकि पर्यावरणविद् धीरेंद्र जोशी का कहना है कि मौसमी ग्लेशियरों का विकास पूरी तरह मौसम पर निर्भर करता है। यदि फरवरी-मार्च में तापमान अचानक बढ़ता है या अधिक बारिश होती है, तो बर्फ तेजी से पिघल सकती है। पिछले वर्षों में मौसम के बदलाव के कारण सीजनल ग्लेशियरों की संख्या में कमी आई है। इस बार की बर्फबारी को सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
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