Prabhat Vaibhav,Digital Desk : मकर संक्रांति के बाद राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के विधायक दल में राजनीतिक घटनाक्रम तेज हो गया है। विधायक दल में टूट या एकजुटता को लेकर अटकलें थीं, क्योंकि चार में से तीन विधायक अलग-अलग रवैये दिखा रहे थे।
हालांकि अब दो विधायक—माधव आनंद और आलोक कुमार सिंह—ने मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा से मुलाकात कर एकजुटता का संदेश दिया है। आलोक सिंह ने खुलकर कहा कि नेतृत्व से उनकी कभी असहमति नहीं रही। वहीं, विधायक रामेश्वर महतो अलग चल रहे हैं, लेकिन उनकी गैरमौजूदगी से विधायक दल में टूट की कोई गुंजाइश नहीं मानी जा रही है।
निशांत और आरसीपी की वापसी पर चर्चा
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत की सक्रिय राजनीति में एंट्री और जदयू में आरसीपी सिंह की पुनर्वापसी की संभावनाओं पर भी पार्टी में चर्चा हो रही है। इन मामलों पर निर्णय लेने के लिए केवल मुख्यमंत्री एवं जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार की सहमति की आवश्यकता है।
निशांत के मामले में पार्टी के कई नेताओं ने नीतीश से आग्रह किया है। सामाजिक समारोहों में भी निशांत का समर्थन देखा जा रहा है, लेकिन मुख्यमंत्री परिवारवादी राजनीति के प्रति अपने दृष्टिकोण के चलते अभी निर्णय लेने में दुविधा में हैं।
आरसीपी सिंह की पार्टी में वापसी का मुद्दा भी धीरे-धीरे मुख्यधारा में आ गया है। हाल ही में पटेल छात्रावास में आयोजित दही-चूड़ा भोज के दौरान यह चर्चा शुरू हुई थी। हालांकि पार्टी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह) ने आरसीपी की वापसी पर नकारात्मक रुख रखते हुए इसे इंटरनेट मीडिया में चर्चा का विषय बना दिया।
अतीत के अनुभव
जदयू में किसी भी नेता की वापसी का अंतिम निर्णय हमेशा नीतीश कुमार पर ही निर्भर रहा है। अतीत में पूर्व सांसद अरुण कुमार और उपेंद्र कुशवाहा की वापसी के उदाहरण सामने हैं। चाहे उनके विरोधी रहे हों, लेकिन सम्मानजनक तरीके से उन्हें पार्टी में शामिल किया गया।
नीतीश कुमार के बेहद करीबी रहे ललन सिंह की राय आज भी पार्टी में महत्वपूर्ण मानी जाती है। इंटरनेट मीडिया पर चल रही चर्चाओं में यह भी याद दिलाया जा रहा है कि 2010 के विधानसभा चुनाव में जदयू की ऐतिहासिक जीत में ललन सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
आरसीपी सिंह और ललन सिंह दोनों की सक्रिय भूमिका 2025 के विधानसभा चुनाव में भी अहम मानी जा रही है। 2015 के विधानसभा चुनाव में जदयू के 115 सीटों से घटकर 71 सीटें रह जाने के पीछे लोकसभा चुनाव में केवल दो सीटें जीतना भी एक चुनौती था, जिसमें दोनों नेताओं की भूमिका निर्णायक रही।
इससे स्पष्ट है कि मकर संक्रांति के बाद जदयू में राजनीतिक घटनाक्रम सक्रिय हो गया है और आगामी चुनावों के मद्देनजर विधायकों, नेताओं और परिवार के सदस्यों की रणनीतियों पर सबकी नजरें टिकी हैं।




