Prabhat Vaibhav,Digital Desk : मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर अब तक की सबसे बड़ी और खौफनाक चेतावनी दी है। गुरुवार (2 अप्रैल 2026) को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में ट्रंप ने साफ कर दिया कि अमेरिका का 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' (Operation Epic Fury) अभी थमा नहीं है, बल्कि यह अपने सबसे आक्रामक चरण में प्रवेश करने वाला है। ट्रंप ने घोषणा की है कि अगले दो से तीन हफ्तों के भीतर ईरान पर ऐसा हमला होगा जो उसे दशकों पीछे धकेल देगा।
ऑपरेशन एपिक फ्यूरी: अगले 21 दिन होंगे निर्णायक
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने भाषण में सैन्य रणनीति का खुलासा करते हुए कहा कि ईरानी सीमा के भीतर प्रमुख लक्ष्यों को भेदने का काम लगभग पूरा हो चुका है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा, "हम अगले दो से तीन हफ्तों में ईरान पर अब तक का सबसे करारा प्रहार करने जा रहे हैं। हमारी तैयारी उन्हें पाषाण युग (Stone Age) में वापस भेजने की है, क्योंकि वे वहीं रहने के लायक हैं।" ट्रंप के इस बयान से साफ है कि व्हाइट हाउस अब किसी भी तरह के समझौते के मूड में नहीं है और सैन्य कार्रवाई को चरम पर ले जाने वाला है।
ईरान के पावर प्लांट और बुनियादी ढांचे पर संकट
ट्रंप ने ईरान के ऊर्जा क्षेत्र को सीधी धमकी देते हुए कहा कि यदि वे अब भी समझौते की मेज पर नहीं आते हैं, तो अमेरिका उनके सभी बिजली उत्पादन संयंत्रों (Power Plants) को एक साथ निशाना बनाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस युद्ध का उद्देश्य केवल सैन्य दबदबा बनाना नहीं, बल्कि ईरानी नेतृत्व के पतन के बाद वहां की व्यवस्था को पूरी तरह बदलना है। ट्रंप के अनुसार, "ईरान की नौसेना पहले ही खत्म हो चुकी है, वायुसेना तबाह है और उनके शीर्ष कमांडरों का सफाया हो चुका है। अब बारी उनके अस्तित्व की नींव को हिलाने की है।"
ऐतिहासिक जीत का दावा: 'ऐसी तबाही पहले कभी नहीं देखी गई'
संबोधन के दौरान ट्रंप ने 'ऑपरेशन फ्यूरी' की सफलता का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए कहा कि पिछले चार हफ्तों में अमेरिकी सेना ने वो हासिल किया है जो युद्ध के इतिहास में विरले ही देखने को मिलता है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) पर ईरान का नियंत्रण लगभग समाप्त हो चुका है। ट्रंप ने गर्व से कहा कि इतिहास में कभी भी किसी दुश्मन को इतने कम समय में इतना निर्णायक और भारी नुकसान नहीं पहुँचाया गया है। अब पूरी दुनिया की नजरें अगले तीन हफ्तों पर टिकी हैं, जो मध्य पूर्व का भूगोल बदल सकती हैं।




