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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : धर्म और संस्कृति की वैश्विक राजधानी कही जाने वाली काशी इन दिनों एक अनचाहे सन्नाटे की गिरफ्त में है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच छिड़े भीषण युद्ध ने सात समंदर पार बनारस की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। मार्च से जून का समय वैसे भी पर्यटन के लिहाज से सुस्त माना जाता है, लेकिन इस साल युद्ध की विभीषिका ने विदेशी पर्यटकों की आमद को लगभग शून्य कर दिया है। खाड़ी देशों में हवाई सेवा बाधित होने और युद्ध के फैलने के डर से विदेशी सैलानियों ने अपने 'होली' और 'समर वेकेशन' के ट्रिप रद्द कर दिए हैं।

सात समंदर पार से आने वाले कदम ठिठके: केट की जुबानी दर्द

ब्रिटेन की आईटी प्रोफेशनल केट की कहानी आज हर उस विदेशी पर्यटक की है जो काशी की आध्यात्मिक शांति का अनुभव करना चाहता था। केट ने बताया कि उन्होंने होली पर बनारस आने की पूरी तैयारी कर ली थी, लेकिन जैसे ही ईरान-इजरायल-अमेरिका का संघर्ष शुरू हुआ, उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी। स्थिति में सुधार न होता देख उन्होंने भारी मन से अपनी यात्रा रद्द कर दी। पर्यटन विभाग के आंकड़े भी तस्दीक कर रहे हैं कि जनवरी के बाद से विदेशी सैलानियों की संख्या में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई है।

होटल और गाइडों के सामने 'रोजी-रोटी' की चुनौती

विदेशी पर्यटकों की कमी का सीधा असर स्थानीय गाइडों, होटल उद्योग और सिल्क (बनारसी साड़ी) कारोबार पर पड़ा है। वैश्विक अस्थिरता के कारण ईंधन और गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे होटलों की लागत बढ़ गई है। छोटे स्टॉल मालिकों से लेकर बड़े रेस्टोरेंट संचालकों तक, सभी इस मंदी की चपेट में हैं। टूरिस्ट गाइडों का कहना है कि विदेशी मेहमान न केवल ज्यादा समय रुकते थे, बल्कि वे स्थानीय हस्तशिल्प और खरीदारी में भी काफी रुचि दिखाते थे, जिससे शहर की आर्थिकी चलती थी।

ईंधन संकट और महंगाई की दोहरी मार

युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसका असर वाराणसी के पर्यटन ट्रांसपोर्ट पर भी दिख रहा है। टैक्सी और क्रूज संचालकों के लिए बढ़ी हुई कीमतों के बीच अपनी सेवाएं देना मुश्किल हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यूक्रेन और ईरान जैसे मसले जल्द हल नहीं हुए, तो कोरोना काल के बाद पटरी पर लौट रहा काशी का पर्यटन उद्योग एक बार फिर गहरे गर्त में जा सकता है।

अब 'बाबा' के सावन से ही उम्मीद: व्यापारियों की आस

भले ही विदेशी सैलानियों ने मुंह मोड़ लिया हो, लेकिन स्थानीय व्यापारियों को अब 'बाबा विश्वनाथ' के सावन से बड़ी उम्मीदें हैं। सावन के महीने में देशभर से आने वाले शिवभक्तों की भीड़ काशी की अर्थव्यवस्था को 'संजीवनी' दे सकती है। व्यापारियों का मानना है कि सावन के दौरान बढ़ने वाली धार्मिक गतिविधियों से स्थानीय बाजारों में रौनक लौटेगी और मंदी का असर कुछ कम होगा।

एकजुटता और ठोस कदम की दरकार

काशी की पहचान उसकी जीवंतता और वैश्विक पहुंच से है। वर्तमान संकट से उबरने के लिए पर्यटन विभाग और स्थानीय व्यवसायियों को घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए नई रणनीतियां बनानी होंगी। जब तक वैश्विक हालात सामान्य नहीं होते, तब तक काशी की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने और अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए सामूहिक प्रयासों की अत्यंत आवश्यकता है।