Prabhat Vaibhav,Digital Desk : स्वास्थ्य विज्ञान की दुनिया से एक राहत भरी खबर सामने आई है। हाल ही में किए गए एक विस्तृत शोध में यह पाया गया है कि अधिकांश वयस्कों के शरीर में खसरा (Measles), गलसुआ (Mumps) और रूबेला (Rubella) जैसी गंभीर बीमारियों के खिलाफ मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी बरकरार है। इस शोध ने चिकित्सा जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा है, क्योंकि यह परिणाम बताते हैं कि बचपन में किए गए टीकाकरण या पिछले संक्रमणों का असर शरीर में लंबे समय तक बना रहता है, जो भविष्य में इन बीमारियों के प्रकोप को रोकने में मददगार साबित हो सकता है।
रक्त नमूनों की जांच और आईजीजी एंटीबॉडी का कमाल
शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने प्रतिभागियों के रक्त के नमूनों का गहन विश्लेषण किया। इस प्रक्रिया में मुख्य रूप से यह देखा गया कि क्या उनके शरीर में खसरा, गलसुआ और रूबेला के खिलाफ 'इम्यूनोग्लोबुलिन-जी' (IgG) एंटीबॉडी मौजूद हैं या नहीं। आपको बता दें कि आईजीजी एंटीबॉडी शरीर की वह सुरक्षा कवच है, जो किसी भी वायरस के पुराने हमले या वैक्सीन के प्रभाव को याद रखती है और दोबारा संक्रमण होने पर शरीर की रक्षा करती है। जांच के जो परिणाम सामने आए, वे बेहद उत्साहजनक थे क्योंकि अधिकांश नमूनों में इन एंटीबॉडीज की मौजूदगी पर्याप्त मात्रा में पाई गई।
वयस्कों में बनी हुई है लंबी सुरक्षा कवच (Long-term Immunity)
अक्सर यह माना जाता है कि बचपन में लगे टीकों का असर उम्र बढ़ने के साथ कम हो सकता है, लेकिन इस शोध ने इन आशंकाओं को काफी हद तक कम कर दिया है। परिणामों से स्पष्ट हुआ है कि अधिकांश वयस्कों के शरीर में इन बीमारियों के खिलाफ प्रतिरक्षा तंत्र (Immune System) अभी भी सक्रिय और सतर्क है। विशेषज्ञों का कहना है कि वयस्कों में इस तरह की 'नेचुरल' और 'वैक्सीन-प्रेरित' इम्यूनिटी का बने रहना सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज से एक बड़ी उपलब्धि है, जो सामुदायिक स्तर पर सुरक्षा प्रदान करती है।
क्या अब भी जरूरी है बूस्टर डोज और सावधानी?
हालांकि शोध के नतीजे सकारात्मक हैं, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञ अभी भी सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि भले ही अधिकांश वयस्कों में एंटीबॉडी मिली हैं, लेकिन जिन लोगों की इम्यूनिटी कमजोर है या जिन्हें बचपन में टीका नहीं लगा था, उन्हें अभी भी सतर्क रहने की जरूरत है। इस अध्ययन के निष्कर्षों का उपयोग अब भविष्य की टीकाकरण नीतियों को तैयार करने और यह समझने के लिए किया जाएगा कि खसरा और रूबेला जैसी बीमारियों के पूर्ण उन्मूलन की दिशा में हम कितने करीब हैं। फिलहाल, यह शोध उन लोगों के लिए बड़ी राहत है जो इन संक्रमणों के दोबारा फैलने के डर में जी रहे थे।
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