Bihar Politics: 'वन नेशन-वन इलेक्शन' पास हुआ तो 1 साल पहले थमेगा चुनावी चक्र! CM सम्राट चौधरी के पास बचेंगे सिर्फ इतने महीने
देश में चुनावी सुधारों को लेकर जारी बहस के बीच 'वन नेशन-वन इलेक्शन' (One Nation-One Election) का मुद्दा बिहार की राजनीति के केंद्र में आ गया है। इस समय बिहार में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार है और सम्राट चौधरी सूबे के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हैं। राजनीतिक गलियारों में इस बात का गणित तेजी से लगाया जा रहा है कि यदि केंद्र सरकार संसद की संयुक्त समिति (JPC) की सिफारिशों और चुनाव आयोग के रोडमैप के आधार पर देश में एक साथ चुनाव कराने का कानून अंतिम रूप से पारित करा लेती है, तो इसका सबसे बड़ा और सीधा असर बिहार के आगामी विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा।
2029 के लक्ष्य से 1 साल पहले कराना होगा बिहार चुनाव
वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था और बिहार के हालिया राजनीतिक घटनाक्रम के अनुसार, बिहार विधानसभा का अगला आम चुनाव वर्ष 2030 के आखिरी महीनों में प्रस्तावित है (क्योंकि पिछला चुनाव नवंबर 2025 में संपन्न हुआ था)। लेकिन 'वन नेशन-वन इलेक्शन' के तहत चुनाव आयोग ने जो शुरुआती खाका तैयार किया है, उसके मुताबिक देश में लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का पहला बड़ा चरण वर्ष 2029 में शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। इस फॉर्मूले के तहत, पूरे देश को एक समान टाइमटेबल पर लाने के लिए बिहार विधानसभा का कार्यकाल करीब एक साल पहले ही यानी 2029 के आम चुनाव के साथ समाप्त करना पड़ सकता है।
CM सम्राट चौधरी के पास बचेंगे सिर्फ इतने महीने
बिहार में सत्ता परिवर्तन के बाद 15 अप्रैल 2026 को सम्राट चौधरी ने बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में कमान संभाली थी। सामान्य परिस्थितियों (5 साल के कार्यकाल) के हिसाब से उनका यह कार्यकाल अक्टूबर-नवंबर 2030 तक चलना चाहिए, यानी उनके पास मुख्यमंत्री के तौर पर काम करने के लिए लगभग 54 से 55 महीने का वक्त था। लेकिन यदि 2029 में देश में एक साथ चुनाव का नियम लागू हो जाता है, तो बिहार विधानसभा को समय से करीब 12 से 14 महीने पहले (संभावित रूप से अप्रैल-मई 2029 में लोकसभा चुनाव के साथ) भंग करना पड़ेगा। ऐसे में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पास अब सरकार चलाने और अपनी नीतियां जमीन पर उतारने के लिए केवल 32 से 34 महीने का समय ही शेष बचेगा।
बिहार के सियासी समीकरणों में मचेगी भारी हलचल
इस कानून के लागू होने की सुगबुगाहट ने ही बिहार में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों खेमों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। अगर चुनाव 2029 में लोकसभा के साथ होते हैं, तो राष्ट्रीय मुद्दे और केंद्र सरकार का चेहरा राज्य के चुनावों पर पूरी तरह हावी हो सकता है। बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे का लाभ मिलने से एनडीए को राज्य में बड़ी बढ़त मिल सकती है। दूसरी तरफ, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और महागठबंधन के नेताओं का तर्क है कि समय से पहले चुनाव थोपना बिहार की जनता के जनादेश का अपमान होगा और इससे क्षेत्रीय विकास की योजनाएं बीच में ही लटक जाएंगी।