पूर्वी चंपारण में पवित्र स्नान के दौरान तालाब में डूबने से चार मासूम बच्चियों की दर्दनाक मौत
बिहार का महापर्व और माताओं द्वारा अपनी संतानों की लंबी उम्र और आरोग्यता के लिए रखा जाने वाला अत्यंत पवित्र जितिया व्रत इस साल पूर्वी चंपारण जिले के लिए एक कभी न भूलने वाला दुखद और काला अध्याय बन गया है। जितिया व्रत के नहान के पावन और उत्सवी माहौल के बीच पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) जिले से एक बेहद मर्मस्पर्शी और हृदयविदारक घटना सामने आई है, जहां पवित्र स्नान और रस्म निभाने के दौरान तालाब में डूबने से चार मासूम बच्चियों की दर्दनाक मौत हो गई। इस भीषण त्रासदी के बाद से पूरे इलाके में मातम पसरा हुआ है और जिन चार मांओं ने अपनी संतानों की लंबी आयु के लिए व्रत रखा था, उनकी अपनी ही गोद उजड़ जाने से कोहराम मच गया है। एक तरफ जहां घरों में पर्व की खुशियां मनाई जा रही थीं, वहीं अचानक हुई इस अनहोनी ने पूरे गांव को आंसुओं के सागर में डुबो दिया है।
जितिया नहान का पावन पर्व और अचानक कैसे बदल गई खुशियां मातम में?
पूर्वी चंपारण के ग्रामीण इलाके में जितिया व्रत के नियमों के अनुसार महिलाएं और उनके परिवार के बच्चे सुबह-सुबह नजदीकी तालाब, नदी या पोखर पर स्नान करने और पारंपरिक रस्में निभाने के लिए पहुंचते हैं। यह दिन माताओं के लिए बहुत खास होता है क्योंकि वे निर्जला उपवास रखकर अपनी संतानों के कल्याण की कामना करती हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, जब ये चारों बच्चियां अन्य लोगों के साथ गांव के पास स्थित एक तालाब पर स्नान करने और पूजा की सामग्री से जुड़े अनुष्ठान करने गई थीं, तभी यह बड़ा हादसा हो गया। नहाने के दौरान पानी की गहराई का अंदाजा न लगा पाने या पैर फिसलने के कारण बच्चियां एक-एक करके गहरे पानी में समाती चली गईं। जब तक आसपास मौजूद लोग या ग्रामीण कुछ समझ पाते और उन्हें बचाने के लिए दौड़ते, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
तालाब के गहरे पानी का खौफनाक सच और रेस्क्यू ऑपरेशन की दर्दनाक दास्तान
घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय ग्रामीणों में हड़कंप मच गया और वे तुरंत तालाब की ओर भागे। आनन-फानन में गोताखोरों और स्थानीय लोगों की मदद से चारों बच्चियों को पानी से बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक उनकी सांसें थम चुकी थीं। जब उनके शवों को बाहर लाकर परिजनों के सामने रखा गया, तो वहां मौजूद हर शख्स का कलेजा फट पड़ा। माताओं की चीत्कारों से पूरा आसमान गूंज उठा। सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस प्रशासन और अंचल अधिकारी मौके पर पहुंचे और स्थिति को संभाला। पुलिस ने चारों शवों को अपने कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। इस प्रशासनिक लापरवाही और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने के कारण भी ग्रामीणों में भारी आक्रोश देखा जा रहा है, क्योंकि ग्रामीण इलाकों के तालाबों पर ऐसे पर्वों के दौरान बैरिकेडिंग या सुरक्षा के कोई प्रबंध नहीं होते हैं।
चार परिवारों का उजड़ गया संसार, पूरे गांव में पसरा सन्नाटा और चूल्हे तक नहीं जले
यह हादसा केवल चार बच्चियों की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने चार अलग-अलग हंसते-खेलते परिवारों को हमेशा के लिए उजाड़ दिया है। जिन मांओं ने सुबह अपनी बेटियों को सज-धजकर और प्यार से स्नान करने भेजा था, उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनकी लाड़लियां इस तरह कभी लौटकर वापस नहीं आएंगी। इस हृदयविदारक घटना के बाद पूरे गांव में चूल्हे तक नहीं जले हैं। हर तरफ सिर्फ और सिर्फ चीख-पुकार और रोने की आवाजें सुनाई दे रही हैं। रिश्तेदारों, पड़ोसियों और सांत्वना देने वाले लोगों का तांता लगा हुआ है, लेकिन किसी के पास भी उन बेसहारा मांओं के आंसुओं को पोछने के लिए सांत्वना के दो शब्द नहीं हैं। जितिया का यह पवित्र त्योहार अब पूर्वी चंपारण के इतिहास में सबसे दर्दनाक दिन के रूप में दर्ज हो चुका है।
त्योहारों के दौरान सुरक्षा और प्रशासनिक सतर्कता की उठी गंभीर मांग
इस মর্মান্তिक और दुखद घटना के बाद एक बार फिर यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे बड़े और सामूहिक पर्वों के दौरान प्रशासन द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए जाते? तालाबों और नदियों के किनारे खतरे के निशान या पुलिस बल की तैनाती क्यों सुनिश्चित नहीं की जाती? स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जिला प्रशासन से मांग की है कि पीड़ित परिवारों को तुरंत उचित मुआवजा दिया जाए और भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए सभी जल स्रोतों के पास सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए जाएं, ताकि किसी अन्य मां को इस तरह अपनी संतान को न खोना पड़े। यह त्रासदी हम सभी को यह सोचने पर मजबूर करती है कि उत्सवों के दौरान थोड़ी सी भी लापरवाही कितनी भारी कीमत वसूल सकती है।