जब रामजस अग्रवाल ने चेक फाड़कर सादे कागज पर लिख दिए थे 50 हजार रुपये

जब रामजस अग्रवाल ने चेक फाड़कर सादे कागज पर लिख दिए थे 50 हजार रुपये

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई ऐसे गौरवशाली पन्ने दर्ज हैं जो आज भी देशवासियों के सीने को गर्व से चौड़ा कर देते हैं, और ऐसा ही एक प्रेरणादायक और ऐतिहासिक प्रसंग झारखंड के कोयलांचल क्षेत्र झरिया से जुड़ा हुआ है। देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और झरिया के महान स्वतंत्रता सेनानी एवं उद्योगपति रामजस अग्रवाल के बीच का संबंध आज भी त्याग, समर्पण और राष्ट्रप्रेम की एक अनूठी मिसाल माना जाता है। इतिहास के पन्नों में दर्ज इस घटना के अनुसार, जब बापू देश की आजादी और हरिजन कल्याण के लिए धन संग्रह करने निकले थे, तब झरिया की धरती ने ऐसा ऐतिहासिक दान दिया जिसे आज भी लोग श्रद्धा के साथ याद करते हैं। रामजस अग्रवाल ने अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुए न केवल बापू की झोली भर दी थी, बल्कि उनके इस त्याग ने यह साबित कर दिया कि झारखंड के सपूतों ने देश की आजादी के यज्ञ में अपना सब कुछ समर्पित करने में कभी पीछे नहीं हटे।

धनबाद और झरिया की क्रांतिकारी धरती पर बापू के ऐतिहासिक कदम

झारखंड का झरिया इलाका आज भले ही अपनी कोयला खदानों और औद्योगिक पहिचान के लिए जाना जाता हो, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब यह क्षेत्र देश की आजादी की लड़ाई और वैचारिक आंदोलनों का एक बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था। महात्मा गांधी जब अपने स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक सुधार के अभियानों के सिलसिले में झरिया पहुंचे थे, तो वहां के लोगों में एक अलग ही ऊर्जा और उत्साह देखने को मिला था। झरिया के व्यवसायियों, कामगारों और स्वतंत्रता सेनानियों ने बापू का दिल खोलकर स्वागत किया था। बापू का यह दौरा केवल एक राजनीतिक यात्रा नहीं थी, बल्कि यह देश के कोने-कोने में स्वदेशी और राष्ट्रीय एकता की अलख जगाने का एक महाअभियान था, जिसमें झरिया के प्रबुद्ध नागरिकों ने बढ़-चढ़कर अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी।

जब रामजस अग्रवाल ने चेक फाड़कर सादे कागज पर दे दी 50 हजार रुपये की बड़ी सहायता

इस पूरी ऐतिहासिक घटना का सबसे रोमांचक और भावुक पल तब आया जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी फंड जुटाने के लिए झरिया के दानदाताओं के बीच बैठे थे। रामजस अग्रवाल, जो उस क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित और संपन्न व्यवसायी होने के साथ-साथ राष्ट्रभक्त भी थे, उन्होंने बापू के कार्यों में सहयोग करने का मन बनाया। कहा जाता है कि जब रामजस अग्रवाल ने सहायता राशि देने के लिए चेक बुक निकाली और उसमें रकम भरने लगे, तो बापू ने उन्हें रोकते हुए कुछ ऐसा कहा जिसने उनके दिल को झकझोर दिया। गांधी जी ने कहा कि देश की आजादी और गरीबों के कल्याण के लिए दिए जाने वाले दान पर किसी बैंक या औपचारिकता की मुहर नहीं होनी चाहिए। यह सुनते ही रामजस अग्रवाल ने बिना एक पल गंवाए उस चेक को फाड़कर फेंक दिया और एक सादे कागज पर अपने हस्ताक्षर करके 50 हजार रुपये की बड़ी सहायता राशि सौंप दी। उस दौर में 50 हजार रुपये की रकम आज के करोड़ों रुपए के बराबर आंकी जा सकती है, जो उनके असीम त्याग को दर्शाती है।

देश सेवा और त्याग की यह कहानी आज की युवा पीढ़ी के लिए एक बड़ी प्रेरणा

महात्मा गांधी और रामजस अग्रवाल से जुड़ी यह घटना हमें यह सिखाती है कि जब देश पर संकट हो या राष्ट्र निर्माण का महान कार्य चल रहा हो, तो व्यक्तिगत स्वऔर संपत्तियों का कोई मूल्य नहीं रह जाता। रामजस अग्रवाल जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों और दानवीरों ने कभी अपने नाम या शोहरत की परवाह नहीं की, बल्कि उन्होंने निस्वार्थ भाव से अपनी गाढ़ी कमाई देश की आजादी के नाम कर दी। आज की आधुनिक और तेज रफ्तार दुनिया में जब लोग हर चीज में अपना नफा-नुकसान देखने लगे हैं, तब झरिया के इतिहास की यह गाथा हमें हमारे उन पुरखों के संस्कारों की याद दिलाती है जिनकी बदौलत आज हम स्वतंत्र भारत में खुली हवा में सांस ले रहे हैं।

झरिया के गौरवशाली अतीत को सहेजने और संवारने की जरूरत

आज के समय में नई पीढ़ी को इस बात से अवगत कराना बेहद आवश्यक है कि झारखंड और विशेषकर झरिया-धनबाद क्षेत्र का स्वतंत्रता संग्राम में कितना अमूल्य योगदान रहा है। महात्मा गांधी के पैरों के निशान और उनके द्वारा स्थापित किए गए उच्च आदर्श आज भी इस क्षेत्र की मिट्टी में रचे-बसे हैं। रामजस अग्रवाल जैसे देशभक्तों की जीवन गाथाएं आने वाले कई दशकों तक देश के युवाओं को राष्ट्र सेवा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती रहेंगी। झरिया का यह गौरवशाली इतिहास केवल किताबों के पन्नों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे हर भारतीय के दिल में जिंदा रखा जाना चाहिए ताकि हम अपने देश की आजादी के असली महत्व को हमेशा समझ सकें।