img

Prabhat Vaibhav,Digital Desk : मिडिल ईस्ट की धरती पर जारी सबसे भीषण युद्ध (Iran-Israel-US War 2026) में ईरान अब पूरी तरह अलग-थलग पड़ता नजर आ रहा है। 28 फरवरी को सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद शुरू हुए इस संघर्ष में ईरान को उम्मीद थी कि उसके पुराने दोस्त रूस और चीन ढाल बनकर खड़े होंगे। लेकिन हकीकत इसके उलट है। क्रेमलिन और बीजिंग ने खुद को केवल 'कड़ी निंदा' और संयुक्त राष्ट्र में बैठकों तक सीमित कर लिया है। आखिर क्यों दुनिया की इन दो महाशक्तियों ने ईरान का साथ छोड़ दिया? आइए समझते हैं इसके पीछे के 4 बड़े कारण।

1. रूस की मजबूरी: यूक्रेन का बोझ और 'कानूनी दांवपेंच'

रूस और ईरान ने भले ही 2025 में एक ऐतिहासिक 'रणनीतिक साझेदारी समझौते' पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन इसमें एक बड़ा पेंच है। यह समझौता कोई सैन्य गठबंधन (Military Alliance) नहीं है। इसका मतलब है कि अगर ईरान पर हमला होता है, तो रूस की कोई कानूनी मजबूरी नहीं है कि वह अपनी सेना भेजे।

यूक्रेन का मोर्चा: रूस खुद सालों से यूक्रेन युद्ध में फंसा हुआ है। उसके पास संसाधन सीमित हैं।

हथियारों की मांग नहीं: क्रेमलिन का दावा है कि ईरान ने खुद उनसे कोई सैन्य मदद नहीं मांगी है। पुतिन खुद को एक योद्धा के बजाय एक मध्यस्थ (Mediator) के रूप में पेश करना चाहते हैं।

2. चीन का 'ऑयल डिप्लोमेसी' और आर्थिक स्वार्थ

चीन के लिए ईरान केवल तेल का एक स्रोत है, कोई इमोशनल पार्टनर नहीं। बीजिंग के लिए सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे खाड़ी देश भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

व्यापार सबसे ऊपर: अगर चीन ईरान का खुलकर समर्थन करता है, तो उसके संबंध अरब देशों से खराब हो जाएंगे।

नया नेतृत्व स्वीकार्य: चीनी विशेषज्ञों का कहना है कि बीजिंग को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि तेहरान की गद्दी पर कौन बैठा है, बशर्ते वहां से तेल की सप्लाई और आर्थिक निवेश सुरक्षित रहे। चीन तभी हरकत में आएगा जब 'होर्मुज जलडमरूमध्य' पूरी तरह बंद हो जाए और उसका अपना व्यापार ठप हो जाए।

3. पश्चिम एशिया में संतुलन का 'डेंजरस गेम'

रूस और चीन दोनों ही इस क्षेत्र में अपनी बैलेंसिंग एक्ट (संतुलन बनाने की नीति) को खराब नहीं करना चाहते।

वे ईरान के साथ खड़े होकर इजराइल और अमेरिका को सीधे तौर पर अपना दुश्मन नहीं बनाना चाहते।

किसी एक पक्ष का पक्ष लेने का मतलब है मिडिल ईस्ट के अन्य महत्वपूर्ण साझेदारों को नाराज करना। इसलिए, वे केवल राजनयिक बयानों के जरिए सुरक्षित खेल खेल रहे हैं।

4. अमेरिका से सीधी टक्कर का डर

रूस और चीन दोनों जानते हैं कि अगर उन्होंने ईरान को सीधी सैन्य सहायता या मिसाइलें दीं, तो इसका मतलब होगा अमेरिका (US) के साथ सीधा युद्ध।

परमाणु हथियारों से लैस अमेरिका के साथ सीधी जंग किसी के लिए भी आत्मघाती साबित हो सकती है।

यही कारण है कि रूसी विदेश मंत्रालय केवल "तनाव कम करने" की अपील कर रहा है, जबकि उनके टैंक और मिसाइलें सीमाओं के भीतर ही शांत हैं।