मैनुअल नहीं डिजिटल डाका! कोडिंग के दम पर मिनटों में स्कॉर्पियो पार, नेपाल तक फैला था गिरिडीह

मैनुअल नहीं डिजिटल डाका! कोडिंग के दम पर मिनटों में स्कॉर्पियो पार, नेपाल तक फैला था गिरिडीह

अपराध की दुनिया में जैसे-जैसे तकनीक का विकास हो रहा है, वैसे-वैसे अपराधियों के तौर-तरीके भी पूरी तरह बदलते जा रहे हैं। एक जमाना था जब गाड़ियों को चुराने के लिए चोरों को मास्टर चाबी, लोहे की रॉड या फिर स्टीयरिंग लॉक तोड़ने जैसी मशक्कत करनी पड़ती थी, जिसमें काफी समय लगता था और पकड़े जाने का खतरा भी बना रहता था। लेकिन अब चोरों ने मैनुअल तरीकों को छोड़कर पूरी तरह डिजिटल डाका डालना शुरू कर दिया है। हाल ही में सामने आए एक सनसनीखेज मामले ने ऑटोमोबाइल सेक्टर और सुरक्षा एजेंसियों के होश उड़ा दिए हैं। झारखंड केगिरिडीह Click to open side panel for more information जिले से संचालित होने वाले एक ऐसे ही हाई-तकनीक वाहन चोर गिरोह का पर्दाफाश हुआ है, जो पलक झपकते ही आधुनिक कोडिंग और सॉफ्टवेयर उपकरणों के दम पर लग्जरी गाड़ियां खासकर स्कॉर्पियो उड़ा लेते थे। इस शातिर गिरोह के तार सिर्फ झारखंड या आसपास के राज्यों तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि इनका पूरा नेटवर्क नेपाल सीमा तक फैला हुआ था, जहां चोरी की गई गाड़ियों को रातों-रात खपाया जाता था। पुलिस और एसटीएफ की संयुक्त कार्रवाई में इस गिरोह के कई बड़े राज खुलकर सामने आए हैं, जिसने देश भर में गाड़ियों की सुरक्षा पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

कैसे काम करता था गिरिडीह का यह हाई-तकनीक डिजिटल चोर गिरोह

 

गिरिडीह

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गिरिडीह Click to open side panel for more informationके इस शातिर गिरोह ने वाहन चोरी के पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह अलविदा कह दिया था। ये शातिर चोर किसी भी गाड़ी का शीशा तोड़े बिना या उसका लॉक जबरन खोले बिना ही उसे आसानी से चुरा लेते थे। इसके लिए वे अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, लैपटॉप और प्रोग्रामिंग डिवाइसेज का इस्तेमाल करते थे। जब ये चोर किसी सुनसान इलाके या पार्किंग में खड़ी स्कॉर्पियो को निशाना बनाते थे, तो वे गाड़ी के ऑन-बोर्ड डायग्नोस्टिक्स यानी OBD पोर्ट में अपना स्पेशल डिवाइस कनेक्ट कर देते थे। इसके बाद लैपटॉप में विशेष कोडिंग सॉफ्टवेयर के जरिए गाड़ी के डिजिटल सिक्योरिटी सिस्टम और रिमोट लॉक को हैक कर लिया जाता था। चंद मिनटों के भीतर कार का कंप्यूटर री-प्रोग्राम हो जाता था और पुरानी चाबी का कोड निष्क्रिय करके नया कोड सेट कर दिया जाता था। इस तरह बिना किसी अलार्म के बजने या किसी को कानो-कान खबर हुए बिना यह गिरोह लग्जरी गाड़ियों को पलक झपकते ही स्टार्ट करके फरार हो जाता था। तकनीक के इस गलत इस्तेमाल ने पुलिस अधिकारियों को भी हैरान कर दिया है कि कैसे साधारण दिखने वाले अपराधी इतने हाई-टेक टूल्स का इस्तेमाल करने लगे हैं।

झारखंड से लेकर नेपाल तक फैला था तस्करी का यह पूरा मायाजाल

इस गिरोह का दायरा सिर्फ एक शहर या राज्य तक सीमित नहीं था, बल्कि इसकी जड़ें बहुत गहरी थीं।गिरिडीह Click to open side panel for more information को अपना सेफ जोन बनाने वाले ये अपराधी झारखंड के अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों में सुनसान जगहों पर खड़ी स्कॉर्पियो और अन्य बड़ी गाड़ियों की रेकी करते थे। गाड़ी चुराने के बाद वे तुरंत उसके नंबर प्लेट और जीपीएस ट्रैकर को हटा देते थे ताकि कोई उनका पीछा न कर सके। इसके बाद गाड़ियों को एक तयशुदा रूट के जरिए उत्तर प्रदेश के रास्ते नेपाल सीमा की तरफ रवाना कर दिया जाता था। नेपाल में इस गिरोह के स्थानीय संपर्क और खरीदार मौजूद थे, जो चोरी की इन गाड़ियों को बेहद कम दामों में खरीद लेते थे या फिर उनके फर्जी कागजात तैयार करके उन्हें दूर-दराज के इलाकों में बेच देते थे। अंतरराष्ट्रीय सीमा तक फैले इस नेटवर्क को तोड़ने के लिए कई राज्यों की पुलिस लंबे समय से जुटी हुई थी। आखिरकार तकनीकी सर्विलांस, सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल्स के आधार पर पुलिस ने इस सिंडिकेट के मुख्य सरगना तक पहुंचने में सफलता हासिल कर ली और इस अंतरराज्यीय रैकेट का पर्दाफाश कर दिया।

पुलिस की विशेष कार्रवाई और आरोपियों से बरामद हुए खतरनाक इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स

जब पुलिस ने इस हाई-प्रोफाइल चोरी के मामले में अपनी जांच का दायरा बढ़ाया, तो उन्हें कई चौंकाने वाले सुराग मिले। पुलिस नेगिरिडीह Click to open side panel for more information और उसके आसपास के संदिग्ध ठिकानों पर छापेमारी करके इस गिरोह के कई सदस्यों को दबोच लिया। आरोपियों के पास से जो बरामदगी हुई, उसे देखकर पुलिस भी सन्न रह गई। उनके पास से महंगे लैपटॉप, कई प्रकार के प्रोग्रामिंग डिवाइस, ब्लैंक स्मार्ट की, ओबीडी स्कैनर और दर्जनों फर्जी नंबर प्लेट बरामद किए गए। पूछताछ के दौरान आरोपियों ने स्वीकार किया कि उन्होंने पिछले कुछ महीनों में दर्जनों स्कॉर्पियो गाड़ियों को इसी हाई-टेक तरीके से चुराया है और उन्हें नेपाल के रास्ते तस्करी कर बेचा है। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन चोरों को ये महंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और कोडिंग सॉफ्टवेयर कहां से मिलते थे और इस अवैध कारोबार में उनके साथ और कौन-कौन से बड़े लोग या कबाड़ कारोबारी जुड़े हुए हैं। इस बड़ी सफलता के बाद पुलिस वाहन मालिकों को भी सतर्क रहने की सलाह दे रही है ताकि वे अपनी गाड़ियों की अतिरिक्त सुरक्षा सुनिश्चित कर सकें।

आधुनिक वाहनों की डिजिटल सुरक्षा और वाहन स्वामियों के लिए जरूरी सावधानी

इस पूरी घटना से यह बात साफ हो जाती है कि जैसे-जैसे गाड़ियां स्मार्ट और डिजिटल होती जा रही हैं, वैसे-वैसे चोरों ने भी अपने अपराध करने के तरीके पूरी तरह हाई-टेक कर लिए हैं। कार निर्माताओं द्वारा दी जाने वाली डिजिटल सुरक्षा प्रणालियों को भी ये शातिर अपराधी अपनी कोडिंग के दम पर मात देने में कामयाब हो रहे हैं। ऐसे में वाहन चालकों और मालिकों के लिए यह बेहद जरूरी हो गया है कि वे अपनी गाड़ियों की सुरक्षा को लेकर और अधिक सतर्क रहें। केवल फैक्ट्री से मिलने वाले लॉकिंग सिस्टम पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अतिरिक्त मैनुअल स्टीयरिंग लॉक, हिडन बैटरी कट-ऑफ स्विच या उच्च गुणवत्ता वाले जीपीएस ट्रैकर्स का इस्तेमाल किया जाना चाहिए ताकि यदि चोर गाड़ी का सॉफ्टवेयर हैक भी कर लें, तो भी वे उसे आसानी से आगे न ले जा सकें। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां भी इस मामले में लगातार निगरानी बढ़ा रही हैं ताकि इस तरह के अन्य गिरोहों का समय रहते खात्मा किया जा सके और आम जनता की गाढ़ी कमाई से खरीदी गई संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।