कोयलाकर्मियों के पीएफ के 1300 करोड़ रुपये निजी हाउसिंग कंपनी में निवेश का बड़ा घोटाला

कोयलाकर्मियों के पीएफ के 1300 करोड़ रुपये निजी हाउसिंग कंपनी में निवेश का बड़ा घोटाला

देशभर के ऊर्जा और औद्योगिक क्षेत्र को अपनी कड़ी मेहनत और खून-पसीने से रोशन करने वाले कोयला श्रमिकों (Coal Workers) के भविष्य और उनके सुरक्षित बुढ़ापे से जुड़ी जिंदगीभर की जमापूंजी यानी प्रोविडेंट फंड (PF) के पैसे को लेकर एक बहुत बड़ा और सनसनीखेज घोटाला सामने आया है। झारखंड और देश के अन्य कोयला क्षेत्रों में काम करने वाले लाखों कोयलाकर्मियों के भविष्य निधि ट्रस्ट से जुड़ी इस चौंकाने वाली खबर ने न केवल श्रम संगठनों बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र में भूचाल ला दिया है। मामला यह है कि कोयला कर्मचारियों के कल्याण और उनके सुरक्षित भविष्य के लिए जमा किए गए करीब 1300 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि को नियमों को ताक पर रखकर एक निजी हाउसिंग फाइनेंस कंपनी और रियल एस्टेट से जुड़े उपक्रमों में बिना किसी पुख्ता सुरक्षा गारंटी के निवेश कर दिया गया था। जब वित्तीय बाजार में मंदी आई और उस निजी कंपनी की हालत खराब हुई, तो कोयलाकर्मियों के निवेश किए गए पैसों में से भारी-भरकम रकम यानी लगभग 727 करोड़ रुपये पूरी तरह से डूब गए। अपनी मेहनत की एक-एक पाई को जीवनभर के सहारे के रूप में जोड़ने वाले इन गरीब और मेहनतकश कोयलाकर्मियों के साथ हुआ यह आर्थिक अन्याय अब देश की न्यायपालिका के दरवाजे तक पहुंच चुका है, जहां से इस काले कारनामे की तह तक जाने के लिए बहुत बड़ा फरमान जारी हुआ है।

झारखंड हाईकोर्ट का ऐतिहासिक और कड़ा फैसला: अनियमितताओं को देख अदालत ने दिए सीधे CBI जांच के आदेश

कोयला कर्मचारियों के पीएफ फंड के डूबने और इस वित्तीय हेराफेरी के खिलाफ दायर की गई जनहित याचिकाओं एवं कानूनी दलीलों पर सुनवाई करते हुए झारखंड हाईकोर्ट (Jharkhand High Court) की खंडपीठ ने इस पूरे प्रकरण को अत्यंत गंभीरता से लिया है। अदालत ने अपने कड़े आदेश में यह स्पष्ट कर दिया है कि जिस प्रकार से कोयलाकर्मियों के भविष्य निधि के पैसों को नियमों की धज्जियां उड़ाकर जोखिम भरे निजी क्षेत्रों में झोंका गया और सैकड़ों करोड़ रुपये जनता के डूब गए, वह किसी साधारण प्रशासनिक चूक का परिणाम नहीं बल्कि एक गहरी साजिश का हिस्सा हो सकता है। हाई कोर्ट ने इस पूरे घोटाले की निष्पक्ष, पारदर्शी और गहराई से जांच करने की कमान अब देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी यानी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के हाथों में सौंप दी है। अदालत के इस फैसले के बाद से उन तमाम भ्रष्ट अधिकारियों, ट्रस्ट के सदस्यों और निजी कंपनियों के संचालकों की नींद उड़ चुकी है जिन्होंने पर्दे के पीछे बैठकर इस पूरे घोटाले की रूपरेखा तैयार की थी। न्यायपालिका के इस सख्त रुख से यह उम्मीद बंध गई है कि इस मामले में लिप्त बड़े से बड़े चेहरे भी कानून के शिकंजे से बच नहीं पाएंगे और दोषियों को उनकी करनी की सजा मिलकर रहेगी।

कैसे हुआ था 1300 करोड़ का यह निवेश और किन लोगों की मिलीभगत से डूबे 727 करोड़ रुपये?

जांच के शुरुआती दस्तावेजों और शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह पूरा मामला कोयला भविष्य निधि संगठन (CMPF) के फंड प्रबंधन से जुड़ा हुआ है, जहां नियमों के मुताबिक कर्मचारियों के पैसे को केवल सुरक्षित सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) या उच्च रेटिंग वाले सुरक्षित बैंकों में ही निवेश किया जाना अनिवार्य होता है। इसके बावजूद, कुछ भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारियों और वित्तीय सलाहकारों ने अपनी निजी और व्यावसायिक साठगांठ के चलते उस नियम को दरकिनार किया और एक निजी हाउसिंग कंपनी को मालामाल करने के लिए कोयलाकर्मियों के 1300 करोड़ रुपये वहां ट्रांसफर कर दिए। जब समय पर वह कंपनी मूलधन और ब्याज का भुगतान करने में असमर्थ साबित हुई और मामला डिफॉल्ट की श्रेणी में चला गया, तब जाकर यह खुलासा हुआ कि कर्मचारियों के 727 करोड़ रुपये कागजों पर हमेशा के लिए डूब चुके हैं। इतने बड़े पैमाने पर सरकारी और ट्रस्ट के पैसों की इस लूट ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर किस आधार पर और किसके मौखिक या लिखित आदेश पर इस प्रकार का संदेहास्पद और खतरनाक वित्तीय निर्णय लिया गया था। अब जब सीबीआई इस मामले की फाइलें खोलेगी, तो एक-एक करके उन सभी चेहरों से नकाब उतरेगा जिन्होंने इस घपले को अंजाम देने में अपनी भूमिका निभाई थी।

कोयला श्रमिकों में भारी रोष और न्याय की उम्मीद: भविष्य के लिए कड़े सबक और प्रशासनिक सुधारों की मांग

झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश समेत देश के विभिन्न कोयला खदानों में काम करने वाले लाखों श्रमिकों और उनके परिवारों के बीच इस खबर के आने के बाद से भारी गुस्सा और चिंता का माहौल बना हुआ है। मजदूरों का कहना है कि वे अपनी जान जोखिम में डालकर खदानों के भीतर कोयला निकालते हैं और बदले में मिलने वाली उनकी छोटी सी कमाई का जो हिस्सा भविष्य के लिए कटता है, यदि उसमें भी इस तरह की धोखाधड़ी होने लगे तो वे बुढ़ापे में कहां जाएंगे। श्रमिक संघों ने हाई कोर्ट के सीबीआई जांच के आदेश का स्वागत करते हुए यह मांग की है कि न केवल उन अधिकारियों को जेल भेजा जाए जिन्होंने इस निवेश की अनुमति दी थी, बल्कि डूबी हुई पाई-पाई को उन कंपनियों और अधिकारियों की संपत्ति कुर्क करके वापस वसूला जाए। इस घटना ने देश भर के अन्य प्रोविडेंट फंड और पेंशन ट्रस्टों के सामने भी एक बड़ा आईना रख दिया है कि वे कर्मचारियों के पैसों की सुरक्षा को लेकर कितने सतर्क रहें। अंततः, झारखंड हाईकोर्ट द्वारा दिए गए इस ऐतिहासिक जांच आदेश से यह स्पष्ट संदेश मिल गया है कि देश के मेहनतकश नागरिकों की गाढ़ी कमाई और उनके अधिकारों के साथ खिलवाड़ करने वालों को अब कानून के लंबे हाथों से कोई नहीं बचा सकता है।