मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, SC सर्टिफिकेट रद्द करने का आदेश पलटा

मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, SC सर्टिफिकेट रद्द करने का आदेश पलटा

भारतीय समाज में जाति और उसकी पहचान को लेकर अक्सर कई तरह की भ्रांतियां और कानूनी पेंच देखने को मिलते रहते हैं, लेकिन न्यायपालिका समय-समय पर ऐसे फैसले सुनाती है जो समाज को एक नई दिशा और न्याय का सही पाठ पढ़ाते हैं। इसी कड़ी में मद्रास हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है जो जाति प्रमाण पत्र और सामाजिक पहचान से जुड़े मामलों में एक मील का पत्थर साबित होने वाला है। अदालत ने अपने इस फैसले में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि किसी भी व्यक्ति की जाति का निर्धारण उसके गोरे रंग-रूप, शारीरिक बनावट, अंग्रेजी बोलने के तरीके या आधुनिक जीवनशैली के आधार पर बिल्कुल भी नहीं किया जा सकता है। यह फैसला एक ऐसी याचिका पर सुनवाई के दौरान आया जिसमें एक युवती के अनुसूचित जाति यानी एससी (SC) प्रमाण पत्र को केवल इसलिए रद्द कर दिया गया था कि वह आधुनिक परिवेश में पली-बढ़ी थी और अंग्रेजी में पारंगत थी। कोर्ट ने निचली समितियों और प्रशासनिक अधिकारियों के उस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें उसकी वेशभूषा और संवाद शैली को उसकी जाति का आधार बनाया गया था, और इसके साथ ही युवती के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उसके एससी सर्टिफिकेट को रद्द करने के आदेश को पूरी तरह से पलट दिया।

आधुनिक जीवनशैली और फर्राटेदार अंग्रेजी किसी की जाति तय करने का पैमाना नहीं हो सकती

न्यायमूर्ति ने मामले की सुनवाई करते समय इस बात पर गहरी चिंता और नाराजगी व्यक्त की कि किस प्रकार आज भी प्रशासनिक स्तर पर कुछ रूढ़िवादी धारणाओं के आधार पर लोगों की सामाजिक स्थिति का आकलन किया जाता है। अदालत ने बहुत ही सख्त लहजे में यह टिप्पणी की कि यदि कोई व्यक्ति अच्छी अंग्रेजी बोल लेता है, आधुनिक कपड़े पहनता है, शहरी जीवनशैली अपनाता है या अच्छे ओहदे पर काम करता है, तो इसका यह कतई मतलब नहीं है कि उसकी पैतृक जाति या सामाजिक पृष्ठभूमि बदल गई है। जाति का संबंध जन्म और पैतृक वंशावली से होता है, न कि व्यक्ति के पहनावे या उसकी भाषा पर अधिकार से। याचिकाकर्ता युवती के मामले में राज्य की जांच समिति ने केवल इस आधार पर उसका प्रमाण पत्र अवैध घोषित कर दिया था कि उसका रहन-सहन और तौर-तरीके एक पारंपरिक अनुसूचित जाति के व्यक्ति जैसे नहीं लगते हैं। मद्रास हाईकोर्ट ने इस बचकानी और अवैज्ञानिक सोच को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के हकों को इस तरह के सतही और पूर्वाग्रह से ग्रसित तर्कों के आधार पर छीना नहीं जा सकता। अदालत का यह रुख उन तमाम प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक कड़ा संदेश है जो कागजी बहसों और रूढ़ियों के आधार पर गरीब और पिछड़े वर्गों के असली हकूकों को दरकिनार करने की कोशिश करते हैं।

मद्रास हाईकोर्ट ने निचली समिति की रिपोर्ट को नकारा, न्याय की जीत से आम जनमानस में जगा भरोसा

मद्रास हाईकोर्ट द्वारा दिए गए इस फैसले से न केवल उस पीड़ित युवती को राहत मिली है बल्कि उन तमाम लोगों को भी एक मजबूत कानूनी आधार मिल गया है जो अक्सर इस प्रकार के भेदभावपूर्ण प्रशासनिक रवैये का शिकार होते रहते हैं। अदालत ने विस्तार से यह समझाया कि जाति प्रमाण पत्र जारी करने या उसकी वैधता की जांच करने के लिए कानूनी और वंशीय प्रमाणों की आवश्यकता होती है, न कि किसी व्यक्ति के रंग-रूप या उसकी बौद्धिक क्षमता के आंकलन की। युवती के परिवार ने अदालत में अपने पुश्तैनी दस्तावेजों, स्कूल के रिकॉर्ड और अन्य पुख्ता सबूतों के आधार पर यह साबित किया था कि वे कानूनी रूप से अनुसूचित जाति के दायरे में आते हैं, इसके बावजूद स्थानीय समिति ने केवल सतही बयानों और पूर्वाग्रहों के चलते उनके खिलाफ फैसला सुना दिया था। हाईकोर्ट ने सभी दस्तावेजों और कानूनी प्रावधानों की बारीकी से समीक्षा करने के बाद निचली जाति जांच समिति की उस मनगढ़ंत रिपोर्ट को खारिज कर दिया जिसमें युवती की जाति पर सवाल उठाए गए थे। इस फैसले के आने के बाद कानूनी जानकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने अदालत के इस कदम की भूरी-भूरी प्रशंसा की है और इसे भारतीय न्यायव्यवस्था में समानता के अधिकार की एक बड़ी जीत करार दिया है।

कानून और संविधान के दायरे में जाति की परिभाषा, रूढ़िवादी सोच पर कोर्ट का कड़ा प्रहार

भारतीय संविधान के अनुच्छेद और सामाजिक न्याय के प्रावधान स्पष्ट रूप से यह सुनिश्चित करते हैं कि ऐतिहासिक रूप से पिछड़े और शोषित वर्गों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण और विशेष संरक्षण दिए जाएं, लेकिन कई बार प्रशासनिक अमले की लचर कार्यशैली और दबे-छिपे पूर्वाग्रह इन लाभों के रास्ते में दीवार बन जाते हैं। मद्रास हाईकोर्ट ने अपने इस फैसले के जरिए इसी दीवार को ढहाने का काम किया है और यह साबित कर दिया है कि न्याय की कुर्सी पर बैठे लोग हर प्रकार की रूढ़िवादी सोच से ऊपर उठकर केवल संविधान और साक्ष्यों के आधार पर फैसला लेते हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षा और वैश्वीकरण के इस दौर में देश के किसी भी कोने का नागरिक यदि अंग्रेजी सीख जाता है या आधुनिक तकनीक का उपयोग करने लगता है, तो उसकी इस प्रगति को उसकी मूल पहचान के खिलाफ एक हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। इस ऐतिहासिक न्याय से न केवल प्रशासनिक तंत्र में सुधार की गुंजाइश पैदा हुई है बल्कि यह भी संदेश गया है कि किसी भी नागरिक के संवैधानिक और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए देश की अदालतें हमेशा पूरी तत्परता और संवेदनशीलता के साथ खड़ी हैं।