Prabhat Vaibhav,Digital Desk : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने हालिया फैसले में कहा कि पुष्टि-प्राप्त सार्वजनिक नीलामी को बिना कारण रद्द करना मनमाना और असंवैधानिक है। केवल एक शब्द “अस्वीकार” लिखकर नीलामी रद्द करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है।
अदालत ने लगाई ‘राजशाही मानसिकता’ वाली कार्रवाई पर फटकार
हाईकोर्ट ने कहा कि लोकतांत्रिक भारत में कोई भी सार्वजनिक प्राधिकरण अपने निजी विवेक या निरंकुश शक्तियों के आधार पर आदेश नहीं दे सकता। प्रत्येक आदेश में कारण दर्ज करना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य है।
मुक्तसर का मामला
मामला मुक्तसर के मोहल्ला वाटर वर्क्स की 621 वर्ग गज भूमि से जुड़ा है।
6 मार्च 1987 को तहसीलदार द्वारा नीलामी हुई।
राजविंदर सिंह ने सबसे ऊंची बोली लगाई और नियम अनुसार राशि जमा की।
9 नवंबर 1987 को सेल्स कमिश्नर ने नीलामी की पुष्टि की।
इसके बावजूद 24 मई 1988 को प्राधिकारी ने बिना नोटिस या सुनवाई के केवल “अस्वीकार” लिखकर नीलामी रद्द कर दी।
खरीदार ने इसे सिविल अदालत में चुनौती दी, जिसे निचली अदालतों ने सही ठहराया। राज्य की अपील हाईकोर्ट में खारिज कर दी गई।




