26 दिन बाद हुआ परविंदर सिंह झोटा का अंतिम संस्कार, अंतिम विदाई देने उमड़ा पूरा गांव

26 दिन बाद हुआ परविंदर सिंह झोटा का अंतिम संस्कार, अंतिम विदाई देने उमड़ा पूरा गांव

पंजाब और आसपास के इलाकों में इन दिनों जिस एक दुखद घटना ने हर किसी की आंखें नम कर रखी थीं, वह अब एक बेहद भावुक मोड़ पर पहुंच गई है। पिछले 26 लंबे दिनों से चले आ रहे प्रशासनिक गतिरोध, कानूनी अड़चनों और अनिश्चितता के बाद आखिरकार किसान नेता परविंदर सिंह झोटा का अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव में पूरी तरह संपन्न हो गया। इस लंबी अवधि के दौरान उनके पार्थिव शरीर को लेकर परिवार, समर्थकों और प्रशासन के बीच कई दौर की बातचीत और खींचतान चली, जिसने पूरे इलाके में तनाव और संवेदनशीलता का माहौल बनाए रखा था। आखिरकार सभी पक्षों की सहमति और स्थानीय लोगों के भारी दबाव के बाद वह घड़ी आ गई जब इस जुझारू नेता को उनके चाहने वालों ने भारी मन से अंतिम विदाई दी।

अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब, पूरे गांव में पसरा मातम और आंखों में आंसू

परविंदर सिंह झोटा की अंतिम यात्रा के दौरान उनके पैतृक गांव और आसपास के क्षेत्रों से ऐसा जनसैलाब उमड़ा जिसे देखकर हर किसी का कलेजा फट पड़ा। सड़क के दोनों ओर हजारों की संख्या में किसान, युवा, महिलाएं और दूर-दराज से पहुंचे समर्थक अपने प्रिय नेता की एक झलक पाने के लिए बेताब नजर आ रहे थे। हर किसी की आंखें नम थीं और हवा में गूंजते उनके समर्थन के नारों ने माहौल को और अधिक गमगीन बना दिया। गांव की हर एक गली और चौपाल पर सन्नाटा पसरा हुआ था, सिवाय उन सिसकियों और आंसुओं के जो अपने जुझारू नेता को हमेशा के लिए खोने के गम में बाहर आ रहे थे। सुरक्षा के लिहाज से प्रशासन ने भी भारी पुलिस बल तैनात किया था ताकि अंतिम यात्रा शांतिपूर्ण तरीके से पूरी हो सके।

परिवार और समर्थकों का लंबा संघर्ष, न्याय की मांग के साथ डटे रहे लोग

यह पूरा मामला पिछले 26 दिनों से लगातार सुर्खियों में बना हुआ था क्योंकि परिवार और विभिन्न किसान संगठनों की मांग थी कि जब तक घटना से जुड़े सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच और न्याय सुनिश्चित नहीं होता, तब तक अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा। इस दौरान श्मशान घाट और धरने के स्थलों पर रोज हजारों लोगों का जमावड़ा लगा रहा, जिन्होंने कड़ाके की ठंड और प्रशासनिक दबाव के बावजूद अपने कदम पीछे नहीं हटाए। नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय पंचायतों ने मध्यस्थता करते हुए प्रशासन पर दबाव बनाया कि वे परिवार की मांगों को गंभीरता से लें। इतने लंबे समय तक पार्थिव शरीर के रखे रहने से परिजनों की मानसिक स्थिति और गांव के लोगों का दर्द हर दिन के साथ बढ़ता जा रहा था।

प्रशासन और किसान संगठनों के बीच बनी सहमति के बाद निकला समाधान

आखिरकार कई दौर की मैराथन बैठकों और उच्चाधिकारियों के साथ हुई वार्ताओं के बाद प्रशासन और किसान संगठनों के बीच एक आपसी सहमति बन सकी। प्रशासन ने परिवार की कुछ प्रमुख मांगों को स्वीकार करते हुए निष्पक्ष जांच का लिखित भरोसा दिया, जिसके बाद जाकर गतिरोध समाप्त हुआ और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया आगे बढ़ पाई। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि जब जनता और संगठन किसी मुद्दे पर एकजुट हो जाते हैं, तो प्रशासन को भी उनकी आवाज सुननी ही पड़ती है। हालांकि 26 दिनों तक चले इस प्रशासनिक और सामाजिक संघर्ष ने क्षेत्र के लोगों के दिलों पर एक ऐसा घाव छोड़ दिया है जिसे भरने में शायद अभी लंबा समय लगेगा।

परविंदर सिंह झोटा का जीवन और क्षेत्र में उनका गहरा प्रभाव

परविंदर सिंह झोटा अपने इलाके में एक मुखर, संघर्षशील और जनता के अधिकारों के लिए लड़ने वाले नेता के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में किसानों, मजदूरों और आम आदमी के हितों के लिए कई बड़े आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था, जिसकी वजह से वे आम जनता के बीच काफी लोकप्रिय थे। उनकी अचानक हुई मौत ने उनके समर्थकों को अंदर से झकझोर कर रख दिया है और आज जब उन्हें नम आंखों से अंतिम विदाई दी गई, तो हर कोई यही कह रहा था कि ऐसा जननेता सदियों में कोई एक होता है। उनके जाने से जो खालीपन उनके परिवार और संगठन में आया है, उसे भरना आसान नहीं होगा, लेकिन उनके विचार और संघर्ष हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेंगे।