नवरात्रि के पावन पर्व पर असमंजस: क्या पीरियड्स आने पर रोक देने चाहिए मां दुर्गा के नौ दिनों के व्रत
शक्ति की आराधना के महापर्व यानी शारदीय और चैत्र नवरात्रि का नाम आते ही देश भर के करोड़ों श्रद्धालुओं के घरों में एक अलग ही ऊर्जा, उत्साह और भक्ति का माहौल छा जाता है। नौ दिनों तक चलने वाले इस पवित्र अनुष्ठान में मां दुर्गा के अलग-अलग नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है, और माता के भक्त अटूट श्रद्धा के साथ नौ दिनों तक उपवास रखकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। लेकिन कई बार महिलाओं और युवतियों के जीवन में प्राकृतिक चक्र यानी मासिक धर्म (Periods) इस प्रकार से आ जाता है कि वे असमंजस में पड़ जाती हैं कि क्या इस स्थिति में भी व्रत जारी रखा जा सकता है या नहीं। खासकर तब जब नवरात्रि के पहले ही दिन या व्रत के बीच के दिनों में यह स्थिति उत्पन्न हो जाती है, तो महिलाओं के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उनका व्रत खंडित हो गया है या वे इसे आगे जारी रख सकती हैं। धर्म और शास्त्र इस विषय पर क्या कहते हैं, इसे लेकर समाज में कई प्रकार की भ्रांतियां और असमंजस की स्थितियां बनी रहती हैं, जिन्हें दूर करना हर व्रतधारी महिला के लिए बेहद जरूरी है ताकि वे बिना किसी मानसिक तनाव और guilt के अपनी आस्था को बनाए रख सकें।
ज्योतिषियों और धर्म विशेषज्ञों की राय: शरीर की अशुद्धि और मन की पवित्रता में क्या है अंतर?
जब इस विषय पर देश के प्रतिष्ठित ज्योतिषियों, कथावाचकों और धर्म आचार्यों से मार्गदर्शन मांगा जाता है, तो उनका यह स्पष्ट और एकमत संदेश होता है कि सनातन धर्म कभी भी महिलाओं के प्राकृतिक शारीरिक चक्र को पाप या अशुद्धता के रूप में नहीं देखता, बल्कि यह प्रकृति का एक स्वाभाविक नियम है। ज्योतिषीय और पौराणिक दृष्टिकोण के अनुसार, मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के शरीर को विश्राम की आवश्यकता होती है, इसलिए उन्हें पूजा के दौरान मूर्ति स्पर्श करने, दीपक जलाने या हवन सामग्री को सीधे छूने से मना किया जाता है। हालांकि, इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि ईश्वर के प्रति आपकी भक्ति या आपके द्वारा रखा गया उपवास खंडित हो गया है। यदि आपने नौ दिनों का संकल्प (Sankalp) ले लिया है और पहले दिन ही पीरियड्स आ गए हैं, तो आपको अपना व्रत बिल्कुल बंद करने की आवश्यकता नहीं है। आप शरीर से भले ही अनुष्ठानिक रूप से दूर रहें, लेकिन अपनी श्रद्धा, मानसिक ध्यान और प्रार्थना के जरिए मां दुर्गा से पूरी तरह जुड़ी रह सकती हैं, क्योंकि भगवान कभी भी दिखावे या शारीरिक कर्मकांड से ज्यादा आपके मन की पवित्रता और सच्चे भाव को देखते हैं।
पीरियड्स के दिनों में कैसे करें व्रत और मां दुर्गा की आराधना? जानें मानसिक पूजा के नियम
यदि नवरात्रि के दौरान किसी महिला को मासिक धर्म आ जाता है, तो उसे घबराने या निराश होने के बजाय शास्त्रों में बताए गए नियमों का पालन करते हुए अपनी आस्था को बनाए रखना चाहिए। इन दिनों के दौरान आपको किसी भी मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश नहीं करना चाहिए, पूजा की मूर्तियों या घटस्थापना कलश को स्पर्श नहीं करना चाहिए और अपने घर के अन्य सदस्यों से पूजा-पाठ की सामग्री की व्यवस्था करवानी चाहिए। आप घर के किसी शांत और स्वच्छ कोने में बैठकर मानसिक रूप से मां दुर्गा के मंत्रों का जाप कर सकती हैं, दुर्गा चालीसा का पाठ अपने मन में कर सकती हैं और माता का ध्यान कर सकती हैं। इसे 'मानसिक पूजा' (Mental Worship) कहा जाता है, जिसका फल शारीरिक पूजा से किसी भी रूप में कम नहीं होता है। इसके अलावा, जो महिलाएं उपवास या फलाहार का संकल्प ले चुकी हैं, वे अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए व्रत जारी रख सकती हैं, क्योंकि व्रत का संबंध शरीर की आंतरिक शुद्धि और आत्म-संयम से भी जुड़ा होता है।
स्वास्थ्य और संयम को प्राथमिकता: धर्म और विज्ञान का यह सुंदर तालमेल है जरूरी
धर्म और विज्ञान दोनों ही इस बात पर जोर देते हैं कि मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं और उन्हें ऊर्जा की जरूरत होती है, इसलिए उनके स्वास्थ्य के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाना चाहिए। यदि उपवास रखने से कमजोरी अधिक बढ़ जाती है या स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है, तो धर्मग्रंथों में यह स्पष्ट छूट दी गई है कि स्वास्थ्य को सर्वोपरि रखते हुए व्रत को सामान्य आहार या फलाहार में बदला जा सकता है। माता रानी कभी भी अपने किसी भक्त को कष्ट में देखकर प्रसन्न नहीं होती हैं, बल्कि वे तो एक ममतामयी मां की तरह अपने बच्चों के स्वास्थ्य और कल्याण की कामना करती हैं। आने वाले दिनों में जैसे ही यह प्राकृतिक चक्र पूरा हो जाता है और शरीर की शुद्धि हो जाती है, आप स्नान करके आगे के दिनों में विधिवत रूप से माता की पूजा-अर्चना फिर से शुरू कर सकती हैं। अंततः, नवरात्रि के इन नौ दिनों में शारीरिक कर्मकांड से ज्यादा जरूरी आपका सकारात्मक दृष्टिकोण, मन की निर्मलता और संयमित जीवनशैली है, जो आपकी सच्ची भक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण है।