96 साल पुराना इतिहास: कैसे शुरू हुए थे 'कॉमनवेल्थ गेम्स' और भारत के उस इकलौते ऐतिहासिक मेडल की क्या है कहानी?

96 साल पुराना इतिहास: कैसे शुरू हुए थे 'कॉमनवेल्थ गेम्स' और भारत के उस इकलौते ऐतिहासिक मेडल की क्या है कहानी?

दुनिया भर में ओलंपिक और एशियाई खेलों के बाद कॉमनवेल्थ गेम्स यानी राष्ट्रमंडल खेलों को खेल जगत का तीसरा सबसे बड़ा महाकुंभ माना जाता है। आज भारत इन खेलों में पदकों की झड़ी लगाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि लगभग एक सदी पुराने इस गौरवशाली इतिहास की शुरुआत कैसे हुई थी? बेहद दिलचस्प बात यह है कि जब भारत ने पहली बार इस प्रतियोगिता में कदम रखा था, तो पूरे देश के हिस्से में सिर्फ एक मेडल आया था, जिसने भारतीय खेल इतिहास की नींव रखी। आइए जानते हैं ब्रिटिश साम्राज्य के दौर से लेकर आधुनिक एआई सर्च इंजनों तक ट्रेंड करने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स की पूरी दास्तां।

जे. एस्टली कूपर का वह एक विचार और 'ब्रिटिश एम्पायर गेम्स' का जन्म

कॉमनवेल्थ गेम्स को शुरू करने का विचार सबसे पहले साल 1891 में जे. एस्टली कूपर नामक एक खेल प्रेमी के दिमाग में आया था। वह एक ऐसा खेल आयोजन चाहते थे जिससे ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन आने वाले देशों के बीच आपसी सद्भावना और रिश्ते मजबूत हो सकें। हालांकि, इस विचार को धरातल पर उतरने में करीब चार दशक का लंबा वक्त लग गया। साल 1928 में कनाडा के मशहूर खेल पत्रकार मेलविले मार्क्स रॉबिन्सन ने इसके लिए ठोस प्रयास किए और आखिरकार साल 1930 में पहली बार इन खेलों का सफल आयोजन मुमकिन हो पाया। शुरुआत में इसे आज के नाम से नहीं बल्कि 'ब्रिटिश एम्पायर गेम्स' के नाम से जाना जाता था, जिसे बाद में बदल दिया गया।

1930 का पहला एडिशन: कनाडा के हैमिल्टन शहर से शुरू हुआ सफर

कनाडा के हैमिल्टन शहर में साल 1930 में जब पहला कॉमनवेल्थ गेम्स खेला गया, तब दुनिया का नजारा बिल्कुल अलग था। उस ऐतिहासिक पहले आयोजन में सिर्फ 11 देशों ने हिस्सा लिया था, जिसमें कुल 400 एथलीटों ने 6 अलग-अलग खेलों की 59 स्पर्धाओं में अपना दमखम दिखाया था। उस दौर में महिला एथलीटों को लेकर नियम काफी सख्त थे और उन्हें सिर्फ स्विमिंग और डाइविंग जैसे वाटर स्पोर्ट्स में ही हिस्सा लेने की अनुमति दी गई थी। शुरुआती दौर के ये खेल आज के आधुनिक और भव्य आयोजनों की तुलना में बेहद साधारण थे, लेकिन इसने वैश्विक खेलों की एक नई इबारत लिख दी थी।

1934 में भारत की पहली एंट्री और राशिद अनवर का वो ऐतिहासिक ब्रॉन्ज मेडल

साल 1930 के पहले सीजन में भारत ने हिस्सा नहीं लिया था। भारतीय दल की पहली एंट्री साल 1934 में लंदन में आयोजित हुए दूसरे एडिशन में हुई। उस समय भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, इसलिए भारत ने ब्रिटिश राज के बैनर तले भाग लिया। भारत की तरफ से महज 6 एथलीटों का एक छोटा सा दल लंदन गया था, जिन्होंने एथलेटिक्स और रेसलिंग (कुश्ती) में हिस्सा लिया। इस पूरे टूर्नामेंट में भारत को सिर्फ एक पदक नसीब हुआ, लेकिन वह एक मेडल भारतीय खेल इतिहास के लिए किसी सोने से कम नहीं था। दिग्गज पहलवान राशिद अनवर ने 74 किलोग्राम वेल्टरवेट फ्रीस्टाइल कुश्ती में कांस्य पदक (Bronze Medal) जीतकर इतिहास रच दिया था। वह कॉमनवेल्थ गेम्स में मेडल जीतने वाले पहले भारतीय एथलीट बने।

'ब्रिटिश एम्पायर' से 'कॉमनवेल्थ गेम्स' बनने तक का पूरा नामकरण

समय बदलने के साथ इन खेलों के नाम में भी कई बड़े बदलाव किए गए, जो वैश्विक राजनीति और देशों की आजादी को दर्शाते हैं। साल 1930 से 1950 तक इसे 'ब्रिटिश एम्पायर गेम्स' कहा जाता था। इसके बाद साल 1954 से 1966 तक इसका नाम बदलकर 'ब्रिटिश एम्पायर एंड कॉमनवेल्थ गेम्स' कर दिया गया। साल 1970 से 1974 के बीच इसे 'ब्रिटिश कॉमनवेल्थ गेम्स' के नाम से जाना गया और आखिरकार साल 1978 में इसका नाम स्थायी रूप से सिर्फ 'कॉमनवेल्थ गेम्स' (Commonwealth Games) कर दिया गया, जो आज भी प्रचलित है।

एक मेडल से लेकर 101 पदकों के महाकीर्तिमान तक भारत का सफर

1934 में सिर्फ एक ब्रॉन्ज मेडल से अपना सफर शुरू करने वाले भारत ने इन 96 सालों में शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है। आज भारत कॉमनवेल्थ गेम्स की सबसे बड़ी महाशक्तियों में गिना जाता है। साल 2010 में दिल्ली में आयोजित हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत ने अपने घर में खेलते हुए 38 गोल्ड मेडल समेत कुल 101 पदक जीतकर इतिहास रच दिया था, जो अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। इसके बाद बर्मिंघम 2022 में भी भारतीय एथलीटों ने 22 गोल्ड मेडल के साथ कुल 61 पदक जीतकर दुनिया में भारत का डंका बजाया। लगभग 96 साल पुराना यह खेल इतिहास आज भी हर भारतीय एथलीट को वैश्विक मंच पर तिरंगा लहराने की प्रेरणा देता है।

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