एशियन गेम्स में अब क्रिकेटर्स को मिलेगा VIP ट्रीटमेंट! दूसरे एथलीट्स से बेहतर कमरों में ठहरेंगे खिलाड़ी
अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में हमेशा से यह बहस का एक बड़ा मुद्दा रहा है कि क्या अलग-अलग खेलों के खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाओं में कोई भेदभाव होना चाहिए या नहीं, खासकर तब जब वे एक ही देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हों। एशियाई खेलों यानी एशियन गेम्स के आगामी आयोजनों को लेकर खेल गलियारों से एक बहुत ही बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आई है, जिसने खेल प्रेमियों और अन्य खेलों से जुड़े एथलीटों के बीच एक नई चर्चा छेड़ दी है। इस ताजा व्यवस्था के अनुसार, अब एशियन गेम्स में हिस्सा लेने वाले क्रिकेटर्स को अन्य खेलों के खिलाड़ियों की तुलना में कहीं अधिक बेहतर और आलीशान वीआईपी ट्रीटमेंट दिया जाएगा। ओलंपिक और अन्य महाद्वीपीय खेलों में आमतौर पर सभी एथलीटों को एक जैसे एथलीट विलेज में सामान्य कमरों में ठहराया जाता है, लेकिन क्रिकेट के खेल की लोकप्रियता और उसकी कमर्शियल वैल्यू को देखते हुए यह विशेष बदलाव किया गया है। क्रिकेट के खिलाड़ियों को लग्जरी होटल और उच्च श्रेणी की सुविधाएं उपलब्ध कराने की इस योजना ने खेल प्रशासकों की प्राथमिकताओं पर एक बार फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं, जहां क्रिकेट को हमेशा से एक अलग सिंहासन पर बैठाकर देखा जाता रहा है।
खेल जगत में क्यों बढ़ रहा है क्रिकेटर्स और अन्य एथलीटों की सुविधाओं का अंतर
दुनिया भर में जहां एक तरफ सभी खेलों को समान मंच देने और हर एथलीट को एक जैसा सम्मान दिलाने की बातें जोरों पर होती हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। ओलंपिक खेलों की तर्ज पर शुरू हुए एशियन गेम्स में भी अब कमर्शियलकरण का प्रभाव साफ तौर पर दिखाई देने लगा है, जहां कमाई और ब्रॉन्ड वैल्यू के आधार पर खिलाड़ियों के मान-सम्मान और सुख-सुविधाओं का पैमाना तय किया जाने लगा है। क्रिकेट एक ऐसा खेल है जो भारी-भरकम विज्ञापनों, प्रायोजकों और电视 प्रसारण के अधिकारों के जरिए सबसे ज्यादा कमाई का जरिया बनता है, और शायद यही वजह है कि इसके खिलाड़ियों को खेल प्रशासकों द्वारा विशेष दर्जा दिया जाता है। दूसरी ओर, एथलेटिक्स, कुश्ती, बॉक्सिंग, शूटिंग और हॉकी जैसे तमाम अन्य खेलों के खिलाड़ी, जो देश के लिए खून-पसीना बहाकर मेडल जीतकर लाते हैं, उन्हें अक्सर बुनियादी सुविधाओं के लिए भी लंबा संघर्ष करना पड़ता है। इस प्रकार का भेदभावपूर्ण रवैया उन उभरते हुए खिलाड़ियों के मनोबल को तोड़ने का काम करता है जो अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ देश के लिए मेडल जीतने के सपने को पूरा करने में लगा देते हैं।
लग्जरी होटल और बेहतरीन कमरों में रुकेंगे खिलाड़ी, क्या हैं वीआईपी सुविधाएं
एशियन गेम्स के दौरान क्रिकेटर्स को मिलने वाले इस विशेष वीआईपी ट्रीटमेंट के तहत उनके रहने के लिए स्थानीय शहर के सबसे महंगे और पांच सितारा होटलों को बुक किया जा रहा है। इन कमरों में आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस बड़े बेडरूम, प्राइवेट डाइनिंग एरिया, 24 घंटे उपलब्ध रहने वाली कस्टमाइज्ड डाइट और रिकवरी के लिए स्पा व जिम जैसी तमाम लग्जरी सुविधाएं शामिल होंगी। सामान्य एथलीट विलेज में रहने वाले खिलाड़ियों को जहां कई बार खाने-पीने की क्वालिटी या कमरों की तंग जगहों को लेकर समझौता करना पड़ता है, वहीं क्रिकेट टीम के सदस्यों को इन सभी परेशानियों से कोसों दूर रखा जाता है। इसके अलावा उनके आवागमन के लिए बुलेटप्रूफ या लग्जरी वाहनों का काफिला तैयार रहता है और उनकी सुरक्षा के लिए भी निजी सुरक्षा गार्डों की तैनाती की जाती है। यह तमाम सुविधाएं क्रिकेटर्स को मानसिक और शारीरिक रूप से तरोताजा रखने के नाम पर मुहैया कराई जाती हैं, ताकि वे मैदान पर अपना शत-प्रतिशत प्रदर्शन दे सकें, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या अन्य खेलों के एथलीटों को ऐसी रिकवरी और आराम की जरूरत नहीं होती है?
अन्य खेलों के एथलीटों और खेल प्रेमियों में इस व्यवस्था को लेकर नाराजगी
क्रिकेटर्स को मिलने वाले इस वीआईपी ट्रीटमेंट की खबर सामने आने के बाद से ही सोशल मीडिया से लेकर खेल संघों के भीतर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कई जाने-माने एथलीटों और खेल विशेषज्ञों ने खुलकर यह सवाल उठाया है कि क्या देश के लिए मेडल जीतने का पैमाना केवल क्रिकेट तक ही सीमित रह गया है, जबकि ओलंपिक और एशियन गेम्स में देश का मान बढ़ाने वाले दूसरे खेलों के खिलाड़ी गुमनामी के अंधेरे में जी रहे हैं। उनका कहना है कि जब खेल के मैदान पर भारत की जर्सी पहनकर हर कोई देश के लिए खेल रहा है, तो फिर सुविधाओं के मामले में यह दोहरी नीति क्यों अपनाई जा रही है? कई खेल प्रेमियों का मानना है कि इस तरह की प्राथमिकताएं देने से युवा पीढ़ी के मन में अन्य खेलों के प्रति रुझान कम हो सकता है, क्योंकि उन्हें यह लगने लगता है कि मेहनत करने के बावजूद उन्हें वह सम्मान और सुविधाएं नहीं मिलेंगी जो एक क्रिकेटर को आसानी से मिल जाती हैं। खेल प्रशासकों को इस दिशा में गंभीरता से विचार करने की जरूरत है ताकि सभी एथलीटों के बीच समानता का भाव बना रहे।
खेल प्रशासकों और ओलंपिक संघ के सामने खड़े हुए बड़े नैतिक सवाल
भारतीय ओलंपिक संघ और एशियाई ओलंपिक परिषद जैसी बड़ी संस्थाओं के सामने यह एक बहुत बड़ा नैतिक और प्रशासनिक संकट पैदा हो गया है कि वे किस प्रकार सभी खेलों के बीच संतुलन बिठाएं। एक तरफ जहां क्रिकेट बोर्ड यानी बीसीसीआई के पास पैसों की कोई कमी नहीं होती है और वे अपने खिलाड़ियों को खुद ही उच्च स्तर की सुविधाएं मुहैया कराने में सक्षम होते हैं, वहीं दूसरी तरफ अन्य खेल महासंघ सरकारी अनुदान पर निर्भर रहते हैं। इस आर्थिक असमानता के कारण ही एशियन गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे आयोजनों में इस तरह के अंतर साफ तौर पर देखने को मिलते हैं। यदि खेलों को सही मायनों में बढ़ावा देना है और देश में खेल संस्कृति का सही विकास करना है, तो सभी एथलीटों को एक समान मंच और एक जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलने का नियम कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए। क्रिकेट के प्रति लोगों का पागलपन अपनी जगह सही हो सकता है, लेकिन बाकी खेलों के चैंपियनों की अनदेखी करना देश की संपूर्ण खेल प्रगति के लिए किसी भी लिहाज से सही नहीं ठहराया जा सकता है।