यूपी ने दुतकारा, बंगाल ने संवारा, मोहम्मद शमी की वो कहानी, जिसने 900 विकेट का रास्ता तय किया
क्रिकेट के मैदान पर जब भी अपनी रफ्तार और सटीक सीम पोजीशन से बल्लेबाजों की गिल्लियां बिखेरने वाले गेंदबाजों का जिक्र होता है, तो भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार पेसर मोहम्मद शमी का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के एक छोटे से गांव सहसपुर अलीनगर से निकलकर दुनिया के सबसे खतरनाक गेंदबाजों में शुमार होने तक का उनका यह सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। आज शमी ने क्रिकेट जगत में अपनी गेंदबाजी के दम पर जो मुकाम हासिल किया है, उसके पीछे संघर्ष, आंसुओं और कभी हार न मानने वाले जज्बे की एक लंबी दास्तान छिपी हुई है। अपने करियर की शुरुआत में उत्तर प्रदेश की घरेलू क्रिकेट टीम में जब उन्हें लगातार नजरअंदाज किया गया और सिस्टम की कमियों के कारण उन्हें दुतकारा गया, तब बंगाल की माटी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अपनी टीम में संवारकर एक नया जीवनदान दिया। आज जब मोहम्मद शमी क्रिकेट के इतिहास में 900 से अधिक अंतरराष्ट्रीय और घरेलू विकेटों के जादुई आंकड़े की तरफ तेजी से बढ़ चुके हैं, तो हर कोई उनके उस संघर्ष को याद कर रहा है जिसने उन्हें भारत का ग्लोबल स्पीड स्टार बना दिया।
उत्तर प्रदेश की घरेलू क्रिकेट में जब प्रतिभा को नहीं मिला सम्मान
हर युवा खिलाड़ी का सपना होता है कि वह अपने गृह राज्य की तरफ से खेलकर देश के लिए मैदान पर उतरे, लेकिन मोहम्मद शमी के साथ शुरुआती दौर में इसका बिल्कुल उलट अनुभव हुआ। उत्तर प्रदेश की रणजी ट्रॉफी टीम के ट्रायल के दौरान चयनकर्ताओं की आंखें उनकी असाधारण गति और स्विंग को नहीं देख पाईं, और उन्हें लगातार राजनीति तथा भाई-भतीजेवाद का शिकार होना पड़ा। जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक के अधिकारियों के सामने अपनी फरियाद लेकर भटकने वाले शमी को हर बार निराशा ही हाथ लगी, जिससे उनका युवा मन बेहद आहत हुआ। उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के उस समय के चयनकर्ताओं की यह बहुत बड़ी भूल थी कि उन्होंने अपनी ही जमीन पर पलने वाली इस दुर्लभ प्रतिभा को बिना किसी ठोस कारण के रिजेक्ट कर दिया। जब किसी खिलाड़ी के सपनों का गला घोंटने की कोशिश की जाती है, तो या तो वह खेल छोड़ देता है या फिर और अधिक मजबूत होकर उभरता है, और शमी ने दूसरे रास्ते को चुनते हुए अपनी किस्मत खुद लिखने का फैसला किया।
बंगाल की धरती ने पहचाना हुनर, कोलकाता से शुरू हुई असली उड़ान
उत्तर प्रदेश से मायूस होकर लौटने के बाद मोहम्मद शमी के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उनकी पूरी तकदीर बदलकर रख दी, और यह चमत्कार पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से हुआ। कोलकाता के मशहूर क्लब क्रिकेट और मोहन बागान जैसी संस्थाओं से जुड़े लोगों ने जब नेट्स पर शमी की गेंदबाजी का सामना किया, तो वे उनकी रफ्तार और सीम मूवमेंट को देखकर दंग रह गए। बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन यानी सीएबी ने बिना कोई देर किए उस युवा तेज गेंदबाज की प्रतिभा को परखा और तुरंत अपनी रणजी टीम में शामिल करते हुए उन्हें खेलने का भरपूर मौका दिया। बंगाल की आबोहवा और वहां के खेल प्रशासकों के भरोसे ने शमी के अंदर एक नया आत्मविश्वास भर दिया, जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कोलकाता की सड़कों और ईडन गार्डन्स के मैदान पर पसीना बहाते हुए शमी ने अपनी गेंदबाजी को निखारा और अपनी मेहनत के दम पर बंगाल को देश के घरेलू सर्किट की सबसे मजबूत टीमों में ला खड़ा किया।
अपनी धारदार गेंदबाजी से मोहम्मद शमी ने तय किया 900 विकेटों का सफर
घरेलू क्रिकेट में बंगाल के लिए शानदार प्रदर्शन करने के बाद मोहम्मद शमी ने जल्द ही भारतीय राष्ट्रीय टीम के दरवाजे खटखटाए और इंटरनेशनल क्रिकेट में धमाकेदार अंदाज में पर्दापण किया। टेस्ट, वनडे और टी20 तीनों ही फॉर्मेट में अपनी घातक सीम गेंदबाजी, पुरानी गेंद से रिवर्स स्विंग कराने की अद्भुत कला और सटीक यॉर्कर के दम पर उन्होंने दुनिया के बड़े-बड़े बल्लेबाजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। करियर में कई बार गंभीर चोटों, सर्जरी और निजी जीवन के उतार-चढ़ाव के बावजूद शमी ने मैदान पर हमेशा शानदार वापसी की और अपनी फिटनेस से ज्यादा अपनी स्किल पर भरोसा दिखाया। टेस्ट क्रिकेट में रेड बॉल से बल्लेबाजों की धज्जियां उड़ाना हो या फिर वनडे विश्व कप के मुकाबलों में अपनी फिरकी और रफ्तार से विकेटों का अंबार लगाना हो, शमी ने हर मंच पर खुद को साबित किया। फर्स्ट क्लास क्रिकेट, लिस्ट ए, टी20 और इंटरनेशनल मुकाबलों को मिलाकर अब उनके विकटों का कुल आंकड़ा 900 के ऐतिहासिक मील के पत्थर के बेहद करीब पहुंच चुका है, जो किसी भी भारतीय तेज गेंदबाज के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।
यह सफलता उन सभी युवाओं के लिए मिसाल है जो संघर्षों से घबराते हैं
मोहम्मद शमी की यह अविश्वसनीय यात्रा सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन लाखों युवाओं के लिए एक मजबूत प्रेरणा है जो अपने शुरुआती दौर में असफलताओं और उपेक्षाओं का सामना करते हैं। यदि उत्तर प्रदेश क्रिकेट संघ ने उन्हें सही समय पर अपना लिया होता, तो शायद वे आज उत्तर प्रदेश की तरफ से खेल रहे होते, लेकिन बंगाल की गोद में जाकर संवरना शायद उनकी किस्मत में ही लिखा था। जीवन में जब कभी कोई दरवाजा बंद होता है, तो मेहनत और ईमानदारी के रास्ते दूसरे बड़े रास्ते अपने आप खुल जाते हैं, और शमी ने इस बात को अपने आक्रामक और अनुशासित खेल से साबित करके दिखाया है। आज जब वे भारतीय तिरंगे को सीने पर सजाकर मैदान पर उतरते हैं, तो पूरा देश उनकी हर एक गेंद पर गर्व महसूस करता है। उत्तर प्रदेश की उपेक्षा से लेकर बंगाल के दुलार और फिर विश्व पटल पर भारत की शान बढ़ाने तक का मोहम्मद शमी का यह सफर आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।