राज्यसभा चुनाव की सरगर्मी: उत्तराखंड की एक सीट के लिए भाजपा में 15 दावेदारों के नाम चर्चा में
उत्तराखंड की राजनीतिक गलियारों में इन दिनों राज्यसभा की एक खाली होने वाली सीट को लेकर सुगबुगाहट अपने चरम पर है। नवंबर महीने में उत्तराखंड से राज्यसभा की एक महत्वपूर्ण सीट रिक्त होने जा रही है, जिसके लिए चुनाव का पूरा कार्यक्रम तय हो चुका है। छह अक्टूबर तक नामांकन की अंतिम तिथि होने के कारण राजनीतिक दलों में बैठकों और मंथन का दौर तेज हो गया है। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर इस एक सीट के लिए टिकट पाने की होड़ इतनी ज्यादा है कि प्रदेश संगठन की ओर से कोई छोटा-सा पैनल भेजने के बजाय सीधे तौर पर 15 मजबूत दावेदारों के नामों की सूची केंद्रीय नेतृत्व को सौंप दी गई है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पार्टी हाईकमान किसी पुराने दिग्गज को मौका देगा या फिर किसी बिल्कुल नए और चौंकाने वाले चेहरे को संसद के ऊपरी सदन में भेजने का दांव खेलेगा।
उत्तराखंड राज्यसभा सीट के लिए बढ़ती खींचतान और 15 नामों का पैनल
राज्यसभा की इस सीट के लिए जब प्रदेश भाजपा कोर कमेटी की बैठक हुई थी, तब शुरुआत में एक छोटा पैनल बनाने पर विचार चल रहा था। लेकिन जैसे-जैसे दावेदारों की लंबी सूची सामने आई, स्थिति स्पष्ट हो गई कि पार्टी के भीतर टिकट के चाहने वालों की कतार काफी लंबी है। पूर्व मंत्रियों, वरिष्ठ सांगठनिक पदाधिकारियों और क्षेत्रीय क्षत्रपों ने अपने स्तर पर पूरी ताकत झोंकनी शुरू कर दी है। प्रदेश संगठन ने बिना किसी स्थानीय पक्षपात के सभी 15 प्रमुख दावेदारों के नामों की फेरलिस्ट केंद्रीय पार्लियामेंट्री बोर्ड को भेज दी है। हाईकमान के स्तर पर अब जातीय समीकरण, क्षेत्रीय संतुलन यानी गढ़वाल और कुमाऊं की हिस्सेदारी, तथा आने वाले विधानसभा चुनावों की रणनीति को ध्यान में रखते हुए अंतिम मुहर लगाई जानी है।
क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों को साधना भाजपा के लिए क्यों है अहम
उत्तराखंड की राजनीति में हमेशा से क्षेत्रीय संतुलन (गढ़वाल बनाम कुमाऊं) और जातियों का गणित बहुत बड़ा फैक्टर रहा है। वर्तमान में उत्तराखंड से राज्यसभा में प्रतिनिधित्व कर रहे चेहरों में महेंद्र भट्ट और कल्पना सैनी शामिल हैं, जो क्रमशः ब्राह्मण और ओबीसी वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। ऐसे में आगामी राजनीतिक नफा-नुकसान को देखते हुए पार्टी फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। सूत्रों का कहना है कि हाईकमान इस बार किसी ऐसे नाम पर मुहर लगा सकता है जो सभी भौगोलिक और सामाजिक समीकरणों को साधने में पूरी तरह फिट बैठे। यही कारण है कि सूची में शामिल कई ऐसे नाम भी चर्चा में हैं जिनकी सक्रियता सीधे तौर पर पारंपरिक राजनीति से हटकर सांगठनिक या सामाजिक क्षेत्रों में रही है।
छह अक्टूबर से पहले कभी भी हो सकता है हाईकमान के नाम का ऐलान
चूंकि नामांकन की आखिरी तारीख नजदीक आ चुकी है, इसलिए अगले एक-दो दिनों के भीतर कभी भी दिल्ली से आधिकारिक घोषणा की जा सकती है। भाजपा की यह पारंपरिक शैली रही है कि वह बड़े और रणनीतिक चुनावों में अक्सर ऐसे नाम सामने लाती है जिसकी किसी ने उम्मीद भी नहीं की होती है। इस बार भी राजनीतिक पंडित यह अनुमान लगा रहे हैं कि पार्टी किसी चौंकाने वाले चेहरे को आगे कर सकती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और प्रदेश नेतृत्व के साथ केंद्रीय बोर्ड की अंतिम मंत्रणा के बाद जैसे ही नाम का ऐलान होगा, उत्तराखंड के राजनीतिक तापमान में और अधिक उबाल आना तय माना जा रहा है।