पाकिस्तान में गहराया आंतरिक संकट: आसिम मुनीर के दावों की खुली पोल
पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा और सैन्य नीतियों को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है, जिसने देश के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर के तमाम दावों की पोल खोल दी है। एक प्रमुख पाकिस्तानी और अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थानों के आंकड़ों के अनुसार, देश में पिछले 12 सालों में सबसे ज्यादा आतंकवादी और विद्रोही हमले दर्ज किए गए हैं। यह स्थिति तब है जब पाकिस्तानी सेना और हुक्मरान लगातार देश में शांति और स्थिरता बहाल होने के दावे करते नहीं थकते। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल उलट नजर आ रही है, जहां पाकिस्तानी सेना सीधे तौर पर बलूच विद्रोहियों और अन्य सशस्त्र समूहों के मुख्य निशाने पर आ चुकी है।
बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सैन्य चौकियों पर लगातार बढ़ते हमले
पाकिस्तान के भीतर विशेषकर बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा प्रांतों में सुरक्षा हालात बद से बदतर हो चुके हैं। बलूच विद्रोहियों और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के लड़ाकों ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के खिलाफ लगभग खुला मोर्चा खोल दिया है। आए दिन सैन्य काफिलों, चौकियों और सामरिक ठिकानों पर इम्प्रोवाइज्ड डिवाइसेज़ (IED) और गोरिल्ला हमलों को अंजाम दिया जा रहा है। इन विद्रोही हमलों के कारण पाकिस्तानी सेना को भारी जनहानि का सामना करना पड़ रहा है, और सेना का मनोवैज्ञानिक दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि पिछले एक दशक में पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा का ग्राफ इतना कभी नहीं गिरा था, जितना मौजूदा सैन्य नेतृत्व के कार्यकाल के दौरान देखा जा रहा है।
असीम मुनीर के नेतृत्व पर उठे गंभीर सवाल और प्रोपेगेंडा की पोल
जब से जनरल असीम मुनीर ने पाकिस्तानी सेना की कमान संभाली है, तब से उनका पूरा जोर अपनी छवि को मजबूत करने और राजनीतिक नियंत्रण साधने पर रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर और कूटनीतिक बैठकों में पाकिस्तान को एक मजबूत और स्थिर क्षेत्रीय ताकत के रूप में पेश करने की कोशिश की जाती है। हालांकि, एक स्वतंत्र थिंक टैंक और मीडिया रिपोर्ट्स ने इस तथाकथित 'प्रोपेगेंडा मॉडल' को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। रिपोर्ट बताती है कि देश के भीतर राजनीतिक दमन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन और लोकतांत्रिक आवाजों को कुचलने की नीतियों ने आंतरिक असंतोष को और अधिक हवा दे दी है। जनता और सेना के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है।
अफगानिस्तान सीमा पर बढ़ता तनाव और क्षेत्रीय कूटनीति की विफलता
पाकिस्तान की कूटनीति मोर्चे पर भी गहरी विफलता देखने को मिल रही है। एक तरफ जहां पाकिस्तानी सेना सीमा पार आतंकवाद को रोकने में असमर्थ साबित हो रही है, वहीं अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के साथ भी रिश्ते रसातल में चले गए हैं। शरणार्थियों की वापसी और सीमावर्ती झड़पों के कारण दोनों देशों के बीच लगातार सैन्य तनाव बना रहता है। इसके अलावा, ईरान के साथ भी सीमा पर कई बार सैन्य टकराव की स्थिति पैदा हो चुकी है। यह सब इस बात का प्रमाण है कि क्षेत्रीय स्थिरता का दम भरने वाला पाकिस्तान खुद अंदरूनी मोर्चे पर घिर चुका है और उसकी नीतियां उसके लिए ही नासूर बनती जा रही हैं।
आंतरिक गृहयुद्ध और बिखराव के मुहाने पर खड़ा पाकिस्तान
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि मौजूदा सैन्य और प्रशासनिक नीतियों में बदलाव नहीं किया गया, तो आने वाले समय में पाकिस्तान को और अधिक गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। देश के भीतर आर्थिक बदहाली, महंगाई और कुप्रबंधन से त्रस्त आम नागरिक पहले से ही त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। ऐसे में विद्रोहियों के लगातार और घातक हमले इस बात का संकेत देते हैं कि पाकिस्तान की केंद्रीय सत्ता की पकड़ अपने ही भूभाग पर कमजोर होती जा रही है। आने वाले दिनों में यह आंतरिक संघर्ष पाकिस्तान की एकता और अखंडता के लिए एक बड़ा खतरा बनकर उभर सकता है।