अमेरिका-चीन के क्रिटिकल मिनरल वॉर में भारत को बंपर फायदा! क्या है 16,300 करोड़ का पूरा खेल?

अमेरिका-चीन के क्रिटिकल मिनरल वॉर में भारत को बंपर फायदा! क्या है 16,300 करोड़ का पूरा खेल?

वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर सुपरपॉवर देशों के बीच तकनीकी और आर्थिक वर्चस्व की एक नई जंग छिड़ चुकी है जिसे क्रिटिकल मिनरल वॉर कहा जा रहा है। इस महासंग्राम के केंद्र में अमेरिका और चीन आमने-सामने हैं क्योंकि भविष्य की तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रिक वाहन और रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर पूरी तरह से कुछ चुनिंदा दुर्लभ खनिजों पर निर्भर करते हैं। इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भारत के लिए एक ऐतिहासिक और रणनीतिक अवसर पैदा हुआ है, जिससे देश को आर्थिक और तकनीकी मोर्चे पर जबरदस्त बढ़त मिलने जा रही है। भारत सरकार ने इस वैश्विक भू-हलचल को भांपते हुए नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM) के तहत 16,300 करोड़ रुपये के भारी-भरकम निवेश का खाका तैयार किया है, जो देश की तकदीर और तस्वीर दोनों बदलने के लिए पूरी तरह तैयार है।

अमेरिका-चीन मिनरल वॉर और ग्लोबल सप्लाई चेन का बदलता समीकरण

आज की तारीख में स्मार्टफोन से लेकर अत्याधुनिक फाइटर जेट्स और स्पेसक्राफ्ट तक सब कुछ रेयर अर्थ एलिमेंट्स और क्रिटिकल मिनरल्स पर टिके हुए हैं। चीन ने दशकों की सुनियोजित रणनीति के तहत इन खनिजों के खनन और रिफाइनिंग पर वैश्विक स्तर पर एकाधिकार स्थापित कर लिया था। दुनिया के कुल रिफाइंड मिनरल मार्केट का एक बहुत बड़ा हिस्सा अकेले ड्रैगन के नियंत्रण में है। जब भी बीजिंग और वाशिंगटन के बीच व्यापारिक या कूटनीतिक तनाव बढ़ता है, तो चीन इन खनिजों के निर्यात पर पाबंदियां लगाकर पूरी दुनिया की सप्लाई चेन को बंधक बना लेता है। अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी देश इस चीनी शिकंजे से बाहर निकलने के लिए लंबे समय से एक भरोसेमंद और मजबूत विकल्प की तलाश कर रहे थे। यही वजह है कि अमेरिका ने भारत के साथ रणनीतिक हाथ मिलाया है ताकि तकनीक और खनिजों के मामले में चीन पर निर्भरता को पूरी तरह से खत्म किया जा सके।

16,300 करोड़ रुपये के मेगा मिशन का पूरा आंतरिक गणित और रणनीति

भारत सरकार के नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM) और इससे जुड़ी कैपेक्स सपोर्ट योजनाओं के तहत कुल 16,300 करोड़ रुपये से अधिक का बड़ा वित्तीय निवेश किया जा रहा है। इस भारी-भरकम फंड का मुख्य उद्देश्य देश के भीतर ही लिथियम, निकेल, कोबाल्ट, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे 24 सबसे महत्वपूर्ण खनिजों की प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग के लिए आधुनिक कारखाने स्थापित करना है। सरकार इसके तहत कंपनियों को योग्य और भारी निवेश पर पूंजीगत सब्सिडी दे रही है। इस पूरी योजना के पीछे सरकार का विजन यह है कि भारत सिर्फ कच्चे खनिजों का एक्सपोर्टर या आयातक देश बनकर न रह जाए, बल्कि वैल्यू एडिशन के जरिए उच्च शुद्धता वाले कंपाउंड अपने ही देश में तैयार करे। इसके लिए देश के विभिन्न हिस्सों में अत्याधुनिक प्रोसेसिंग प्लांट लगाने का काम तेजी से शुरू हो चुका है, जिससे निवेशकों को भी बंपर रिटर्न मिलने की उम्मीद है।

भारत के घरेलू उद्योगों, ईवी सेक्टर और मेक इन इंडिया को मिलेगा बूस्ट

इस ऐतिहासिक और सामरिक पहल से भारत के डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को अभूतपूर्व गति मिलने वाली है। देश में इलेक्ट्रिक वाहनों यानी ईवी (EV) की मांग में पिछले कुछ वर्षों में जबरदस्त उछाल आया है। ईवी की रीढ़ उसकी बैटरियां होती हैं, जिनके निर्माण के लिए लिथियम, निकेल और कोबाल्ट अनिवार्य कच्चा माल हैं। जब ये सभी सामग्रियां भारत में ही प्रोसेस होकर आसानी से मिलने लगेंगी, तो देश की ऑटोमोबाइल कंपनियां बिना किसी विदेशी रुकावट के कम लागत पर बेहतरीन बैटरियां तैयार कर सकेंगी। इसके अलावा लार्ज-स्केल बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) के जरिए सौर और पवन ऊर्जा को स्टोर करने की हमारी क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। इलेक्ट्रॉनिक्स, डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर और स्पेस टेक्नोलॉजी जैसे सेक्टरों को भी इस स्वदेशी इकोसिस्टम का सीधा और बड़ा लाभ मिलेगा।

भू-राजनीतिक मोर्चे पर भारत की बढ़ती ताकत और आत्मनिर्भरता

अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ हुए द्विपक्षीय समझौतों और फ्रेमवर्क के बाद भारत अब ग्लोबल मिनरल सप्लाई चेन का एक अनिवार्य और विश्वसनीय पिलर बन चुका है। जब दुनिया के विकसित देश चीन के एकाधिकार के खिलाफ एक वैकल्पिक व्यवस्था तलाश रहे थे, तब भारत ने समय रहते मजबूत कानून, नीतियां और वित्तीय पैकेज लाकर अपनी स्थिति को बेहद मजबूत कर लिया है। इस नीति के कारण न केवल विदेशी निवेशकों का भारत पर भरोसा बढ़ा है, बल्कि देश के भीतर बड़े पैमाने पर रोजगार के नए अवसर भी सृजित हो रहे हैं। आने वाले वर्षों में जब वैश्विक तकनीक का पहिया घूमेगा, तो भारत महज एक उपभोक्ता देश नहीं बल्कि दुनिया के उन चुनिंदा नीति-निर्धारण करने वाले देशों में शामिल होगा जिनके बिना ग्लोबल टेक मार्केट की कल्पना भी नहीं की जा सकती।