Prabhat Vaibhav,Digital Desk : दुनियाभर में छोटे बच्चों की जान लेने वाले रेस्पिरेटरी सिंसिटियल वायरस (RSV) को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की गई है। World Health Organization (WHO) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, हर साल पांच वर्ष से कम आयु के करीब 1 लाख बच्चों की मौत इस वायरस की वजह से होती है। इनमें से लगभग 97 प्रतिशत मामले मध्यम और निम्न आय वाले देशों में सामने आते हैं। बढ़ते खतरे को देखते हुए WHO ने गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की सुरक्षा के लिए नए टीकाकरण और रोकथाम संबंधी दिशानिर्देश जारी किए हैं।
क्या है RSV और क्यों है खतरनाक?
रेस्पिरेटरी सिंसिटियल वायरस एक संक्रामक वायरस है जो फेफड़ों और श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है। वयस्कों में इसके लक्षण सामान्य सर्दी-जुकाम जैसे दिखाई देते हैं, लेकिन शिशुओं के लिए यह गंभीर और जानलेवा साबित हो सकता है। यह वायरस खांसी और छींक के जरिए तेजी से फैलता है, जिससे नवजात और छोटे बच्चों में निमोनिया और ब्रोंकियोलाइटिस का खतरा बढ़ जाता है।
शिशुओं में दिखने वाले प्रमुख लक्षण
आरंभिक संकेतों में नाक बहना, हल्का बुखार, लगातार खांसी और दूध या भोजन में रुचि कम होना शामिल हैं। यदि बच्चे को सांस लेने में तकलीफ, सीने में घरघराहट या होंठों का नीला पड़ना जैसे लक्षण दिखाई दें, तो यह गंभीर संक्रमण का संकेत हो सकता है। ऐसे मामलों में तुरंत चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है।
WHO की नई टीकाकरण सिफारिश
WHO के अनुसार, जन्म से पहले ही शिशु को सुरक्षा देना सबसे प्रभावी रणनीति है। गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के 28वें सप्ताह के बाद RSV वैक्सीन लगवाई जा सकती है। इससे मां के शरीर में बनने वाली एंटीबॉडी गर्भ में पल रहे शिशु तक पहुंचती हैं और जन्म के बाद शुरुआती 90 दिनों में संक्रमण का खतरा लगभग 80 प्रतिशत तक कम हो सकता है। कुछ देशों में 32 से 36 सप्ताह के बीच टीकाकरण की सलाह दी जाती है।
नवजातों के लिए एंटीबॉडी सुरक्षा
जिन शिशुओं की माताओं को टीका नहीं लगा है, उनके लिए ‘निरसेविमैब’ नामक मोनोक्लोनल एंटीबॉडी इंजेक्शन उपलब्ध है। इसकी एक खुराक करीब पांच महीने तक सुरक्षा प्रदान करती है। फिलहाल RSV के लिए कोई विशेष एंटीवायरल दवा उपलब्ध नहीं है और गंभीर मामलों में अस्पताल में ऑक्सीजन व सहायक उपचार ही दिया जाता है।
अभिभावकों के लिए जरूरी सावधानियां
गर्भवती महिलाएं अपने डॉक्टर से RSV वैक्सीन को लेकर सलाह लें। नवजात को छूने से पहले हाथों की स्वच्छता का ध्यान रखें और भीड़भाड़ वाली जगहों से दूर रखें। बीमार व्यक्ति से शिशु को अलग रखना भी संक्रमण से बचाव का अहम कदम है। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता, समय पर टीकाकरण और स्वच्छता से हजारों बच्चों की जान बचाई जा सकती है।




