Prabhat Vaibhav,Digital Desk : पश्चिम एशिया (West Asia) में इस्राइल और ईरान के बीच भड़की युद्ध की ज्वाला ने पूरी दुनिया को दहला दिया है। दुनिया के तमाम शक्तिशाली देश जहाँ दो खेमों में बंटते नजर आ रहे हैं, वहीं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर 'ग्लोबल पीसमेकर' की भूमिका निभाते हुए कमान संभाल ली है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की बढ़ती धमक का लोहा मानते हुए पीएम मोदी ने पिछले 24 घंटों के भीतर दुनिया के पांच प्रमुख देशों के शीर्ष नेताओं से फोन पर लंबी चर्चा की है। इस दौरान प्रधानमंत्री ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया कि यह युग युद्ध का नहीं है और बातचीत ही हर समस्या का एकमात्र समाधान है। प्रधानमंत्री के इस 'शांति मंत्र' ने वैश्विक कूटनीति के गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
पांच देशों के दिग्गजों से संवाद और रणनीतिक मंथन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिन पांच देशों के नेताओं से संपर्क साधा है, उनमें अमेरिका, फ्रांस, यूएई और जॉर्डन के राष्ट्राध्यक्ष शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक, पीएम मोदी ने इन नेताओं के साथ साझा चिंता व्यक्त की कि अगर इस्राइल-ईरान जंग और खिंची, तो इसका असर केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और कच्चे तेल की आपूर्ति को भी ध्वस्त कर देगा। प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से एकजुट होने की अपील की ताकि तनाव को कम (De-escalation) किया जा सके। भारत की इस पहल को वाशिंगटन से लेकर पेरिस तक सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है, जहाँ माना जा रहा है कि मोदी ही वह शख्सियत हैं जो दोनों पक्षों के बीच संवाद का सेतु बन सकते हैं।
'युद्ध नहीं, बुद्ध का रास्ता' - पीएम मोदी का वैश्विक संदेश
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) द्वारा जारी संकेतों के अनुसार, पीएम मोदी ने बातचीत के दौरान मानवीय संवेदनाओं और नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखने पर जोर दिया। उन्होंने याद दिलाया कि भारत हमेशा से शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का पक्षधर रहा है। जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री की इस सक्रियता के पीछे भारत का बड़ा आर्थिक हित भी जुड़ा है, क्योंकि पश्चिम एशिया में लाखों भारतीय नागरिक निवास करते हैं और भारत की ऊर्जा सुरक्षा काफी हद तक इसी क्षेत्र पर निर्भर है। पीएम मोदी ने साफ कर दिया है कि भारत किसी भी पक्ष का अंधा समर्थन करने के बजाय शांति और स्थिरता के पक्ष में खड़ा है।
ईरान और इस्राइल को संयम बरतने की नसीहत
प्रधानमंत्री ने अपने संवाद में इस बात पर विशेष बल दिया कि मिसाइल हमलों और जवाबी कार्रवाई के इस सिलसिले को तुरंत रोका जाना चाहिए। भारत के इस कूटनीतिक हस्तक्षेप को चीन और रूस की तुलना में अधिक संतुलित माना जा रहा है। कूटनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि पीएम मोदी की यह 'टेलीफोनिक डिप्लोमेसी' दिखाती है कि नई दिल्ली अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि दुनिया के बड़े संकटों को सुलझाने में एक सक्रिय खिलाड़ी बन चुका है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पीएम मोदी के इस शांति प्रयास के बाद क्या ईरान और इस्राइल अपने आक्रामक रुख में कोई नरमी लाते हैं या दुनिया एक और भीषण तबाही की ओर कदम बढ़ाएगी।
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