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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : भारत में थायराइड विकारों (Thyroid Disorders) का ग्राफ खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। हालिया स्वास्थ्य रिपोर्टों के अनुसार, देश में लगभग 10 प्रतिशत वयस्क आबादी हाइपोथायरायडिज्म से जूझ रही है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एक बड़ी आबादी ऐसी है जो 'सबक्लिनिकल हाइपोथायरायडिज्म' यानी बॉर्डरलाइन थायराइड की शिकार है, जिसके लक्षण बेहद सामान्य होते हैं और लोग इसे अक्सर थकान या तनाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।

क्या है 'बॉर्डरलाइन' थायराइड? रिपोर्ट के अंकों का खेल समझें

अक्सर लोग नियमित हेल्थ चेकअप के बाद अपनी ब्लड रिपोर्ट देखकर उलझन में पड़ जाते हैं। बॉर्डरलाइन थायराइड का मतलब है कि आपके रक्त में TSH (थायराइड स्टिमुलेटिंग हार्मोन) का स्तर थोड़ा बढ़ा हुआ है, लेकिन T3 और T4 का स्तर सामान्य है। डॉक्टर इसे 'सबक्लिनिकल' अवस्था कहते हैं। इसमें मरीज को कोई गंभीर शारीरिक कष्ट नहीं होता, लेकिन शरीर के भीतर हार्मोनल असंतुलन की शुरुआत हो चुकी होती है।

महिलाओं पर 'हार्मोनल अटैक': क्यों हैं वे सबसे ज्यादा जोखिम में?

पुरुषों की तुलना में महिलाएं थायराइड विकारों का शिकार अधिक होती हैं। इसका मुख्य कारण उनके जीवन के विभिन्न चरणों में होने वाले भारी हार्मोनल बदलाव हैं:

गर्भावस्था और प्रसव: इस दौरान शरीर को अधिक थायराइड हार्मोन की आवश्यकता होती है। अनियंत्रित थायराइड मां और बच्चे दोनों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।

रजोनिवृत्ति (Menopause): उम्र के इस पड़ाव पर मेटाबॉलिज्म धीमा होने से थायराइड की समस्या बढ़ जाती है।

स्वप्रतिरक्षित रोग (Autoimmune Diseases): हाशिमोटो थायराइडाइटिस जैसे रोगों के कारण शरीर की रक्षा प्रणाली ही थायराइड ग्रंथि पर हमला करने लगती है।

दिखने में सामान्य, पर भीतर से गंभीर: इन लक्षणों को पहचानें

थायराइड की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके शुरुआती लक्षण किसी बीमारी जैसे नहीं लगते। यदि आप नीचे दिए गए बदलाव महसूस कर रहे हैं, तो यह बॉर्डरलाइन थायराइड हो सकता है:

लगातार हल्की थकान और सुस्ती महसूस होना।

बिना किसी कारण के वजन बढ़ना।

बालों का अधिक झड़ना और त्वचा में रूखापन।

मूड स्विंग्स या चिड़चिड़ापन।

मासिक धर्म चक्र (Periods) में अनियमितता।

क्या करें जब रिपोर्ट आए 'बॉर्डरलाइन'?

विशेषज्ञों के अनुसार, हर बॉर्डरलाइन मामले में दवा शुरू करना जरूरी नहीं होता। यदि आपकी रिपोर्ट में TSH बढ़ा हुआ है, तो ये कदम उठाएं:

दोबारा जांच: 6 से 12 सप्ताह के बाद फिर से टेस्ट करवाएं ताकि ट्रेंड का पता चल सके।

एंटीबॉडी टेस्ट: डॉक्टर की सलाह पर थायराइड एंटीबॉडी परीक्षण करवाएं, जिससे भविष्य के खतरों का पता चल सके।

जीवनशैली में बदलाव: संतुलित आयोडीन युक्त नमक का सेवन करें, तनाव कम करें और वजन पर नियंत्रण रखें।