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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : क्या बुढ़ापे में सेवा न करने पर माता-पिता अपने बच्चों को दी गई संपत्ति वापस ले सकते हैं? इस गंभीर और भावनात्मक कानूनी सवाल पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल सेवा न करने के आधार पर हर बार संपत्ति का ट्रांसफर रद्द नहीं किया जा सकता। इसके लिए 'रखरखाव और कल्याण अधिनियम' की कुछ खास शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की बुजुर्ग पिता की याचिका?

जस्टिस कुलदीप तिवारी की एकल पीठ ने जींद निवासी शिव कुमार की उस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया, जिसमें उन्होंने अपने बेटे के पक्ष में की गई 'रिलीज डीड' को रद्द करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि उनके बेटे ने साल 2018 में छल और प्रलोभन के जरिए मकान और दुकान अपने नाम करवा लिए। पिता का कहना था कि संपत्ति हाथ में आते ही बेटे का व्यवहार बदल गया और उसने देखभाल करना बंद कर दिया।

धारा 23 और 'गुजारा भत्ते की शर्त' का पेच

अदालत ने मामले की कानूनी बारीकियों को समझते हुए स्पष्ट किया कि 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' की धारा 23 के तहत संपत्ति तभी वापस ली जा सकती है, जब ट्रांसफर डीड में यह स्पष्ट लिखा हो कि संपत्ति 'गुजारा भत्ते' (Maintenance) की शर्त पर दी जा रही है।

अदालत ने पाया कि इस मामले में रिलीज डीड में ऐसी किसी शर्त का उल्लेख नहीं था। साथ ही, यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता ने इस मामले को पहले ही सिविल कोर्ट में धोखाधड़ी के आधार पर चुनौती दे रखी है, जो अभी विचाराधीन है।

बेटे को कड़ी फटकार: बकाया गुजारा भत्ता चुकाने का आदेश

भले ही कोर्ट ने संपत्ति का ट्रांसफर रद्द करने से इनकार कर दिया, लेकिन बुजुर्ग पिता के अधिकारों की रक्षा के लिए सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने बेटे को निर्देश दिया कि वह पिता के भरण-पोषण के लिए तय किए गए गुजारा भत्ते की पूरी बकाया राशि आठ समान मासिक किस्तों में अनिवार्य रूप से अदा करे। कोर्ट ने साफ किया कि संपत्ति भले ही बेटे के पास रहे, लेकिन वह पिता के प्रति अपनी वित्तीय जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हट सकता।

बुजुर्गों के लिए क्या है कानूनी सबक?

कानूनी जानकारों का मानना है कि इस फैसले से बुजुर्गों को यह सीख मिलती है कि भविष्य में अपनी संपत्ति बच्चों के नाम ट्रांसफर करते समय 'भरण-पोषण' की शर्त को दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से लिखवाना चाहिए। अगर दस्तावेज में यह दर्ज है कि बच्चा माता-पिता की सेवा करेगा तभी संपत्ति उसकी होगी, तो सेवा न करने की स्थिति में ट्रिब्यूनल उस ट्रांसफर को 'शून्य' घोषित कर सकता है।