Prabhat Vaibhav,Digital Desk : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में दिल्ली में सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन 1 व 2 का उद्घाटन किया। इसके साथ ही सत्ता के प्रमुख केंद्रों की नई पहचान को औपचारिक रूप दिया गया। केंद्र सरकार पिछले कुछ वर्षों से औपनिवेशिक दौर से जुड़े नामों को बदलकर उन्हें संवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़ने की दिशा में कदम उठा रही है। संसद भवन से लेकर राजपथ और साउथ ब्लॉक तक कई प्रतिष्ठित स्थानों के नाम अब बदल चुके हैं।
साउथ ब्लॉक अब ‘सेवा तीर्थ’
13 फरवरी 2026 को साउथ ब्लॉक परिसर का नाम बदलकर ‘सेवा तीर्थ’ कर दिया गया। इसी परिसर में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय और कैबिनेट सचिवालय जैसे अहम कार्यालय स्थित हैं। इससे पहले इसे ‘कार्यकारी एन्क्लेव’ कहा जाता था, लेकिन दिसंबर 2025 में इसका नाम सेवा तीर्थ घोषित किया गया था।
राजपथ बना ‘कर्तव्य पथ’
सितंबर 2022 में ऐतिहासिक राजपथ का नाम बदलकर ‘कर्तव्य पथ’ कर दिया गया। यह मार्ग राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक फैला है और राष्ट्रीय समारोहों का प्रमुख केंद्र रहा है। नए नाम के जरिए नागरिक कर्तव्यों और संवैधानिक जिम्मेदारियों पर जोर देने का संदेश दिया गया।
पुराना संसद भवन अब ‘संविधान भवन’
नई संसद के संचालन शुरू होने के बाद पुराने संसद भवन को ‘संविधान भवन’ नाम दिया गया। यही वह ऐतिहासिक स्थल है जहां 1946 से 1949 के बीच संविधान सभा ने भारत का संविधान तैयार किया था। वहीं, नया भवन अब ‘संसद भवन’ के नाम से जाना जाता है और यही वर्तमान संसदीय कार्यवाही का मुख्य केंद्र है।
केंद्रीय सचिवालय बना ‘कर्तव्य भवन’
नवनिर्मित केंद्रीय सचिवालय को आधिकारिक रूप से ‘कर्तव्य भवन’ नाम दिया गया है। यह नाम कर्तव्य पथ की थीम के अनुरूप रखा गया है और प्रशासनिक ढांचे को नई पहचान देने का प्रयास माना जा रहा है।
रेस कोर्स रोड और मुगल गार्डन के नए नाम
प्रधानमंत्री आवास की ओर जाने वाली रेस कोर्स रोड का नाम ‘लोक कल्याण मार्ग’ किया गया। इसी तरह राष्ट्रपति भवन स्थित प्रसिद्ध मुगल गार्डन अब ‘अमृत उद्यान’ के नाम से जाना जाता है। यह बदलाव ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ की भावना से जोड़ा गया।
राजभवन की जगह ‘लोक भवन’
कुछ राज्यों में राजभवन के नाम को बदलकर ‘लोक भवन’ करने का निर्णय लिया गया है। इसके पीछे तर्क यह दिया गया कि ‘राजभवन’ शब्द औपनिवेशिक मानसिकता की झलक देता है, जबकि ‘लोक भवन’ लोकतांत्रिक भावना को दर्शाता है।
दिल्ली के सत्ता गलियारों में इन नाम परिवर्तनों को केवल औपचारिक बदलाव नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। सरकार का कहना है कि इन कदमों का उद्देश्य राष्ट्रीय पहचान को भारतीय मूल्यों के साथ और मजबूत करना है।




