img

Prabhat Vaibhav,Digital Desk : तेलंगाना की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी भूचाल आने के संकेत मिल रहे हैं। भारत राष्ट्र समिति (BRS) की कद्दावर नेता और पूर्व विधान परिषद सदस्य (MLC) के. कविता अब अपनी खुद की नई राजनीतिक पार्टी लॉन्च करने जा रही हैं। इस मामले में उन्हें देश की राजधानी से बड़ी कानूनी राहत मिली है। दिल्ली हाई कोर्ट ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि के. कविता की नई पार्टी के पंजीकरण (Registration) की प्रक्रिया को नियमानुसार आगे बढ़ाया जाए। इस खबर के बाद दक्षिण भारत से लेकर दिल्ली तक के सियासी गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं कि क्या कविता अब अपनी अलग राह चुनकर एक नई इबारत लिखने वाली हैं।

हाई कोर्ट का हस्तक्षेप और चुनाव आयोग को डेडलाइन

के. कविता ने अपनी नई राजनीतिक पार्टी के रजिस्ट्रेशन में हो रही देरी को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह पार्टी के नाम, सिंबल और पंजीकरण से जुड़ी औपचारिकताओं को समयबद्ध तरीके से पूरा करे। न्यायमूर्ति ने स्पष्ट किया कि यदि सभी कानूनी मापदंड पूरे हैं, तो पंजीकरण की प्रक्रिया में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। कविता के समर्थकों के लिए यह एक बड़ी जीत मानी जा रही है, क्योंकि अब उन्हें अपनी पार्टी के झंडे और बैनर के नीचे चुनावी मैदान में उतरने का कानूनी अधिकार मिल जाएगा।

BRS से अलग पहचान बनाने की कवायद?

के. कविता लंबे समय तक अपने पिता के. चंद्रशेखर राव (KCR) की पार्टी BRS का प्रमुख चेहरा रही हैं। हालांकि, पिछले कुछ समय में हुए राजनीतिक घटनाक्रमों और कानूनी पेचीदगियों के बाद, अब उनका अपनी अलग पार्टी बनाने का फैसला काफी चौंकाने वाला है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कविता अपनी छवि को एक स्वतंत्र और मजबूत महिला नेता के रूप में स्थापित करना चाहती हैं। नई पार्टी का गठन न केवल तेलंगाना की क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित करेगा, बल्कि आगामी चुनावों में वोटों के ध्रुवीकरण और नए गठबंधनों की संभावनाओं को भी जन्म दे सकता है।

पार्टी का नाम और एजेंडा: क्या होगा अगला कदम?

सूत्रों के मुताबिक, के. कविता ने अपनी नई पार्टी के लिए कुछ नाम चुनाव आयोग को सुझाए हैं, जिन पर जल्द ही मुहर लग सकती है। इस नई पार्टी का मुख्य फोकस तेलंगाना के विकास, किसानों के मुद्दे और महिला सशक्तिकरण पर रहने की उम्मीद है। दिल्ली हाई कोर्ट के इस निर्देश के बाद अब सबकी नजरें चुनाव आयोग के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या कविता की यह नई पारी उन्हें फिर से सत्ता के केंद्र में ले आएगी या यह उनके राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा जोखिम साबित होगा? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल उन्होंने अदालत से अपनी पहली लड़ाई जीत ली है।