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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देश के बाद बदरीनाथ धाम में तप्तकुंड के प्राकृतिक गर्म जलस्रोत के वैज्ञानिक अध्ययन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। भारतीय रिमोट सेंसिंग संस्थान (आईआईआरएस) के वैज्ञानिकों की एक टीम बदरीनाथ पहुंच चुकी है, जो गर्म पानी के मूल स्रोत और उसके प्रवाह को लेकर गहन अध्ययन करेगी।

यह टीम मंदिर परिसर और उसके आसपास के पूरे क्षेत्र में जमीन की संरचना, गहराई और भूगर्भीय स्थिति का आकलन करेगी। गौरतलब है कि बीते वर्ष अक्टूबर में अलकनंदा नदी के तट पर बदरीनाथ महायोजना के तहत चल रहे रिवर फ्रंट के कुछ कार्यों को रोक दिया गया था। अब वैज्ञानिक अध्ययन के साथ इन कार्यों को दोबारा शुरू करने की तैयारी की जा रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी बदरीनाथ महायोजना के अंतर्गत अलकनंदा नदी के किनारे रिवर फ्रंट विकसित किया जा रहा है। इस योजना के तहत करीब डेढ़ किलोमीटर क्षेत्र में पिछले दो वर्षों से सुरक्षा दीवार का निर्माण किया जा रहा है।

हालांकि, बदरीनाथ मंदिर के नीचे तप्तकुंड के पास पुराने पुल से लेकर ब्रह्मकपाल तीर्थ तक लगभग 150 मीटर क्षेत्र में रिवर फ्रंट का कार्य अक्टूबर 2025 में रोक दिया गया था। स्थानीय निवासियों, हक-हकूकधारियों और पंडा-पुजारियों ने आशंका जताई थी कि इन निर्माण कार्यों से तप्तकुंड और नारदकुंड जैसे पवित्र जलस्रोतों को नुकसान पहुंच सकता है और मंदिर की सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है।

स्थानीय लोगों का कहना था कि नदी के प्राकृतिक बहाव से छेड़छाड़ के कारण मानसून के दौरान ब्रह्मकपाल तीर्थ जलमग्न हो गया था। यह बात पीएमओ के अधिकारियों के समक्ष भी रखी गई थी, जो निरीक्षण के लिए बदरीनाथ पहुंचे थे।

इन आपत्तियों के बाद पीएमओ ने आईआईटी रुड़की, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान देहरादून और आईआईआरएस के विशेषज्ञों को संयुक्त रूप से यह जिम्मेदारी सौंपी कि वे गर्म जलस्रोतों और मंदिर क्षेत्र की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक ठोस कार्ययोजना तैयार करें।

धार्मिक आस्था से जुड़े हैं तप्तकुंड और अन्य जलस्रोत

बदरीनाथ धाम में मंदिर के आसपास कई प्राकृतिक जलस्रोत मौजूद हैं, जिनका धार्मिक महत्व बहुत गहरा है। जब नए रावल का तिल पात्र होता है, तब उन्हें इन्हीं प्राकृतिक जलधाराओं में स्नान करना अनिवार्य होता है। दर्शन से पहले श्रद्धालु भी तप्तकुंड में स्नान करते हैं, जबकि रावल पूजा से पहले गर्म जलधारा में स्नान कर धार्मिक अनुष्ठान पूरा करते हैं।

अलकनंदा नदी के किनारे स्थित नारदकुंड से ही आदि शंकराचार्य ने भगवान बदरी विशाल की मूर्ति को निकालकर मंदिर में स्थापित किया था, जिससे इन जलस्रोतों का ऐतिहासिक महत्व भी जुड़ा हुआ है।

बदरीनाथ महायोजना के प्रमुख चरण

पहला चरण:
सड़कों का विस्तार, झीलों का सुंदरीकरण, आंतरिक मार्गों का विकास, सिविक सुविधाएं और टूरिस्ट मैनेजमेंट सेंटर का निर्माण पूरा किया जा चुका है।

दूसरा चरण:
रिवर फ्रंट विकास, पुलों का निर्माण, ईवी ट्रैक, चिकित्सालय और तीर्थ पुरोहितों के लिए आवास का निर्माण कार्य प्रगति पर है।

तीसरा चरण:
मंदिर के 75 मीटर गोलाकार क्षेत्र में सुंदरीकरण का कार्य प्रस्तावित है।

अधिकारियों के अनुसार, अध्ययन पूरा होने के बाद यह सुनिश्चित किया जाएगा कि महायोजना के तहत होने वाले सभी निर्माण कार्यों से न तो बदरीनाथ मंदिर को कोई नुकसान पहुंचे और न ही तप्तकुंड व अन्य प्राकृतिक जलस्रोतों की दिशा या स्वरूप में कोई बदलाव हो।