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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : मोदी सरकार ने 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' और 'ईज ऑफ लिविंग' की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए संसद में 'जन विश्वास विधेयक 2026' (Public Trust Bill) को सफलतापूर्वक पारित करा लिया है। राज्यसभा में वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल द्वारा चर्चा का जवाब देने के बाद सदन ने इसे ध्वनि मत से मंजूरी दे दी। बता दें कि लोकसभा पहले ही बुधवार को इस बिल पर अपनी मुहर लगा चुकी थी।

छोटे अपराधों के लिए अब जेल नहीं, सिर्फ जुर्माना

इस क्रांतिकारी कानून का मुख्य उद्देश्य छोटे-मोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी (Decriminalization) से बाहर करना है। अब कई क्षेत्रों में मामूली तकनीकी खामियों या छोटे उल्लंघनों के लिए कारोबारियों और आम नागरिकों को अदालतों के चक्कर नहीं काटने होंगे और न ही जेल जाने का डर रहेगा। सरकार का मानना है कि इससे न्यायपालिका पर बोझ कम होगा और विश्वास-आधारित शासन (Trust-based Governance) को बढ़ावा मिलेगा।

23 मंत्रालय और 79 कानूनों में बड़ा बदलाव

यह विधेयक कोई छोटा बदलाव नहीं बल्कि एक व्यापक कानूनी सुधार है। इसके तहत 23 विभिन्न मंत्रालयों द्वारा प्रशासित 79 केंद्रीय कानूनों में संशोधन किया गया है। बिल के मुख्य आकर्षण निम्नलिखित हैं:

717 प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से हटाया गया: व्यापार को सुगम बनाने के लिए 717 पुराने और जटिल नियमों को अब अपराध नहीं माना जाएगा।

67 संशोधनों का लक्ष्य जीवन सुगमता: आम नागरिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने और सरकारी प्रक्रियाओं को सरल बनाने के लिए 67 प्रावधानों में बदलाव किया गया है।

तर्कसंगत दंड प्रणाली: अब दंड का निर्धारण अपराध की गंभीरता के अनुपात में किया जाएगा। यानी छोटे अपराध पर सिर्फ वित्तीय जुर्माना लगेगा, आपराधिक मुकदमा नहीं।

विपक्ष ने उठाए सवाल, सरकार ने दिया तर्क

संसद में चर्चा के दौरान कांग्रेस के शक्तिसिंह गोहिल ने सरकार पर जल्दबाजी का आरोप लगाया और कहा कि कुछ कानूनों के संशोधन से जनता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। वहीं टीएमसी सांसद मोहम्मद नदीमुल हक ने सवाल किया कि इतने सारे अलग-अलग कानूनों को एक ही बिल में क्यों समेटा गया है।

जवाब में भाजपा सांसद लहर सिंह सिरोया ने स्पष्ट किया कि इस बिल को तैयार करने के लिए 24 सदस्यीय चयन समिति ने 49 बैठकें की हैं। उन्होंने कहा कि यह विधेयक स्टार्टअप्स, एमएसएमई (MSME) और किसानों के लिए वरदान साबित होगा, क्योंकि यह दंडात्मक कार्रवाई के बजाय सुधार और आनुपातिक दंड को प्राथमिकता देता है।