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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : सड़क दुर्घटना के एक अत्यंत संवेदनशील और लंबे समय से लंबित मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट की एकलपीठ जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने जालंधर निवासी वकील नरिंदर पाल सिंह को दिए गए मुआवजे को 52 लाख रुपये से बढ़ाकर 9,16,81,844 रुपये कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यह राशि केवल मुआवजा नहीं, बल्कि पीड़ित की गरिमा, इलाज और भविष्य की सुरक्षा का आधार है।

2002 का हादसा, जिसने बदल दी पूरी जिंदगी

यह मामला 13 अक्टूबर 2002 का है, जब जालंधर में गलत दिशा से आ रही तेज रफ्तार मारुति जेन कार ने नरिंदर पाल सिंह के स्कूटर को टक्कर मार दी थी। उस समय उनकी उम्र महज 26 वर्ष थी और वे वकालत के क्षेत्र में करियर की शुरुआत कर रहे थे। हादसे में सिर और कंधे पर गंभीर चोटें आईं, जिसके बाद वे 100 प्रतिशत स्थायी विकलांगता के शिकार हो गए।

मेडिकल रिपोर्ट ने बताई पीड़ित की गंभीर स्थिति

अदालत में प्रस्तुत मेडिकल दस्तावेजों के अनुसार, नरिंदर पाल सिंह दोनों कानों से पूरी तरह बहरे हो चुके हैं। उनके मस्तिष्क की नसें स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हैं और वे लगातार कानों में गूंज, चक्कर, अनिद्रा और गंभीर अवसाद से पीड़ित हैं। देश के कई बड़े अस्पतालों में इलाज के बावजूद उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।

विदेश में इलाज को बताया अनिवार्य

पीजीआई चंडीगढ़ सहित कई विशेषज्ञों ने राय दी कि जटिल न्यूरो-ब्रेन सर्जरी और कोक्लियर इम्प्लांट के लिए विदेश में उन्नत उपचार जरूरी है। अमेरिका के मेयो क्लिनिक जैसे संस्थानों में इलाज की संभावना को देखते हुए हाईकोर्ट ने भविष्य के विदेशी उपचार के लिए 6 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की।

मुआवजे की पूरी गणना

हाईकोर्ट द्वारा तय किए गए कुल 9.16 करोड़ रुपये के मुआवजे में कई मद शामिल हैं। इसमें आय की हानि के लिए 1.14 करोड़, अब तक हुए चिकित्सा खर्च के लिए 37.17 लाख, शारीरिक दर्द और मानसिक पीड़ा के लिए 30 लाख, और विवाह की संभावनाएं समाप्त होने पर 6 लाख रुपये शामिल हैं।

24 घंटे देखभाल के लिए अटेंडेंट खर्च भी जोड़ा

अदालत ने माना कि पीड़ित को जीवनभर 24 घंटे देखभाल की जरूरत होगी। दो अटेंडेंट्स की व्यवस्था के लिए 1.22 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। साथ ही बीमा कंपनी को बढ़ी हुई राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का निर्देश दिया गया।

बीमा कंपनी की दलीलें खारिज

कोर्ट ने बीमा कंपनी की आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा कि प्रीमियम के रूप में एकत्र किया गया सार्वजनिक धन ऐसे ही पीड़ितों की सहायता के लिए होता है। फैसले के अंत में अदालत ने टिप्पणी की कि यह मुआवजा केवल बीते दर्द की भरपाई नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का प्रयास है कि पीड़ित को भविष्य में सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार मिले।