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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां से 'तीसरे विश्व युद्ध' का रास्ता साफ नजर आने लगा है। इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई शांति वार्ता के बुरी तरह विफल होने के बाद हालात बेकाबू हो चुके हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक आदेश ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा कहे जाने वाले 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) पर बारूदी घेराबंदी कर दी है। इस समुद्री मार्ग की नाकाबंदी ने न केवल खाड़ी देशों में तनाव बढ़ा दिया है, बल्कि दुनिया के शक्तिशाली देशों को दो गुटों में बांट दिया है।

शांति वार्ता की विफलता और ट्रंप का 'सख्त' फैसला

12 अप्रैल 2026 को इस्लामाबाद में आयोजित शांति वार्ता बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई। वार्ता की मेज से उठते ही वाशिंगटन ने आक्रामक रुख अपनाते हुए ईरानी बंदरगाहों की पूर्ण 'समुद्री नाकाबंदी' का ऐलान कर दिया। अमेरिकी नौसेना ने उस मार्ग को घेर लिया है जिससे दुनिया का 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है। इस कदम ने वैश्विक तेल बाजार में हड़कंप मचा दिया है और आशंका जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में ईंधन की कीमतें आसमान छू सकती हैं।

अमेरिका का साथ या ईरान का हाथ? दो गुटों में बंटी दुनिया

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तनाव पूर्ण युद्ध में बदलता है, तो दुनिया स्पष्ट रूप से दो खेमों में विभाजित हो जाएगी:

खेमाप्रमुख देश
अमेरिकी गुटइज़राइल, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा।
ईरान समर्थक गुटरूस, चीन, उत्तर कोरिया और सीरिया।

हैरान करने वाली बात यह है कि जर्मनी, इटली और स्पेन जैसे प्रमुख नाटो (NATO) सहयोगियों ने इस बार अमेरिका को सैन्य सहायता देने से हाथ खींच लिए हैं। इन देशों को डर है कि युद्ध की स्थिति में उनकी ऊर्जा आपूर्ति ठप हो जाएगी और घरेलू स्तर पर महंगाई अनियंत्रित हो जाएगी।

ईरान की जवाबी चेतावनी: 'परमाणु बम' और डिजिटल युद्ध का खतरा

ईरान ने अमेरिकी नाकाबंदी को 'समुद्री डकैती' करार दिया है। तेहरान ने संकेत दिए हैं कि अगर आर्थिक दबाव और बढ़ा, तो वह परमाणु अप्रसार संधि (NPT) से बाहर निकलकर 90 प्रतिशत यूरेनियम संवर्धन शुरू कर देगा। यह सीधे तौर पर परमाणु युद्ध का निमंत्रण होगा। इसके अलावा, हिजबुल्लाह और हौथी विद्रोही जैसे ईरान समर्थित संगठन मध्य पूर्व में अमेरिकी अड्डों पर हमले के लिए पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं।

'डिजिटल पर्ल हार्बर' और आर्थिक तबाही की आशंका

यह संभावित युद्ध केवल मिसाइलों और टैंकों तक सीमित नहीं रहेगा। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ईरान समर्थित हैकर्स पश्चिमी देशों के बैंकिंग सिस्टम और पावर ग्रिड पर 'डिजिटल पर्ल हार्बर' जैसा हमला कर सकते हैं। वहीं, होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक व्यापार ठप हो सकता है, जिसका सबसे बुरा असर भारत जैसे विकासशील और गरीब देशों पर पड़ेगा। कर्ज और महंगाई की मार झेल रही दुनिया के लिए यह युद्ध एक वैश्विक आपदा साबित हो सकता है।