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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : आधुनिक युग का युद्ध अब केवल सैनिकों की संख्या से नहीं, बल्कि चिप और एल्गोरिदम से लड़ा जा रहा है। ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच छिड़े इस भीषण संघर्ष ने दुनिया को युद्ध का एक ऐसा खौफनाक चेहरा दिखाया है, जहां तबाही का सामान आसमान से नहीं बल्कि डेटा के गलियारों से आता है। आज हर किसी के मन में एक ही सवाल है कि इस महायुद्ध में सबसे ज्यादा तबाही किसने मचाई—ईरान के सस्ते 'कामीकाजे' ड्रोन ने, इजराइल की 'अजेय' मिसाइल डिफेंस प्रणाली ने या अमेरिका की 'साइलेंट' कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने?

ईरान की 'स्वार्म' रणनीति: सस्ते ड्रोन और महंगा नुकसान

ईरान ने इस युद्ध में अपनी सबसे बड़ी ताकत 'ड्रोन झुंड' (Drone Swarms) को बनाया है। ईरान के शाहेद-136 जैसे ड्रोन, जिनकी कीमत मात्र 20,000 से 50,000 डॉलर के बीच है, इजराइल की लाखों डॉलर वाली इंटरसेप्टर मिसाइलों के लिए सिरदर्द बन गए हैं। जब दर्जनों ड्रोन एक साथ हमला करते हैं, तो वे दुश्मन की हवाई रक्षा प्रणाली पर भारी दबाव डालते हैं। यह सिर्फ हथियारों की लड़ाई नहीं, बल्कि 'इकोनॉमिक वॉरफेयर' है, जहां ईरान कम लागत में दुश्मन का बड़ा आर्थिक नुकसान कर रहा है।

इजराइल का 'सुरक्षा कवच': आयरन डोम और एरो सिस्टम की चुनौती

ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों के खिलाफ इजराइल ने अपनी तकनीकी श्रेष्ठता का लोहा मनवाया है। इजराइल का 'आयरन डोम' 90% तक की सफलता दर के साथ छोटे रॉकेटों को हवा में ही ढेर कर रहा है। वहीं, लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिए 'एरो' और 'डेविड स्लिंग' जैसी प्रणालियां तैनात हैं। हालांकि, रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि हाइपरसोनिक मिसाइलें, जो ध्वनि की गति से पांच गुना तेज चलती हैं, भविष्य में इन सुरक्षा चक्रों को भेदने की क्षमता रखती हैं।

अमेरिका की सटीक स्ट्राइक: AI और स्टील्थ तकनीक का जलवा

अमेरिका ने इस युद्ध में सीधे मोर्चे के बजाय 'प्रेसिजन स्ट्राइक' यानी सटीक हमलों पर जोर दिया है। टोमाहॉक क्रूज मिसाइलें और एफ-35 जैसे स्टील्थ विमानों ने रडार की नजरों से बचकर ईरान के सामरिक ठिकानों को निशाना बनाया। लेकिन सबसे अदृश्य हथियार रहा 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस'। एआई ने न केवल लक्ष्यों की पहचान की, बल्कि साइबर हमलों के जरिए दुश्मन के रडार और संचार तंत्र को बिना एक भी गोली चलाए अपंग कर दिया।

खामेनेई की मौत और डिएगो गार्सिया पर हमला: युद्ध का नया मोड़

अयातुल्ला अली खामेनेई की तेहरान स्थित परिसर में हुई हत्या ने वैश्विक राजनीति में भूचाल ला दिया है। हालांकि आधिकारिक तौर पर हथियार का नाम गुप्त है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह हाई-प्रिसिजन गाइडेड मूनिशन (PGM) का नतीजा था। वहीं, 21 मार्च 2026 को हिंद महासागर में स्थित अमेरिकी बेस 'डिएगो गार्सिया' पर ईरान के असफल मिसाइल हमले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह युद्ध अब मध्य-पूर्व की सीमाओं को लांघकर वैश्विक स्तर पर फैल चुका है।