Prabhat Vaibhav,Digital Desk : सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल पिछड़े समुदाय से संबंध होने के आधार पर किसी उम्मीदवार को भर्ती के तय नियमों और अनुशासन में कोई विशेष छूट नहीं दी जा सकती। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक रोजगार की चयन प्रक्रिया में 'सहानुभूति, दान या दया' के लिए कोई स्थान नहीं है और नियमों का उल्लंघन करना अन्य योग्य उम्मीदवारों के साथ अन्याय होगा।
'पिछड़ा होना कमजोरी नहीं, नियमों का पालन है अनिवार्य'
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि किसी उम्मीदवार की सामाजिक पृष्ठभूमि उसे नियमों से ऊपर नहीं रखती। कोर्ट ने कड़े शब्दों में टिप्पणी की कि "सार्वजनिक रोजगार के मामलों में कृपा या करुणा को आड़े नहीं आना चाहिए।" बेंच के अनुसार, अगर भर्ती प्रक्रिया में निष्पक्षता और समानता बनाए रखनी है, तो सभी उम्मीदवारों के लिए एक ही मानक होने चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि पिछड़ापन किसी भी उम्मीदवार के लिए चयन मानदंडों को दरकिनार करने का निर्णायक कारक नहीं हो सकता।
क्या था पूरा मामला? दिल्ली पुलिस की अपील पर आया फैसला
यह पूरा विवाद दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल पद की भर्ती से जुड़ा है। एक उम्मीदवार ने प्रारंभिक परीक्षा पास कर ली थी, लेकिन जनवरी 2024 में होने वाले फिजिकल एंड्योरेंस एंड मेजरमेंट टेस्ट (PE&MT) में बीमारी का हवाला देकर शामिल नहीं हुआ। केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) और दिल्ली उच्च न्यायालय ने उम्मीदवार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए दिल्ली पुलिस को उसे दोबारा मौका देने का आदेश दिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन आदेशों को पूरी तरह रद्द कर दिया और दिल्ली पुलिस की अपील को स्वीकार कर लिया।
लापरवाही को बताया 'सुनहरे अवसर का नुकसान'
सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीदवार के व्यवहार को गैर-जिम्मेदारी का "उत्कृष्ट उदाहरण" करार दिया। पीठ ने कहा कि जब लगभग एक लाख उम्मीदवार परीक्षा में शामिल हो रहे थे, तब केवल एक व्यक्ति के लिए नियमों को बदलना पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता को खतरे में डाल देता है। कोर्ट ने नसीहत देते हुए कहा, "जब अवसर सीमित हों, तो उन्हें दोनों हाथों से पकड़ लेना चाहिए।" अदालत ने यह भी पाया कि उम्मीदवार की बीमारी ऐसी नहीं थी कि वह केंद्र पर उपस्थित होकर अपना पक्ष न रख सके, परीक्षा में अनुपस्थित रहना उसके भीतर उत्साह की कमी को दर्शाता है।
भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता सर्वोपरि
अपने फैसले के समापन में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि किसी एक व्यक्ति को विशेष रियायत देने से पूरी भर्ती प्रणाली की निष्पक्षता और अनुशासन भंग होता है। कोर्ट ने साफ किया कि उम्मीदवारों को परीक्षा की तारीख बदलने या पुनर्निर्धारण की मांग करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। इस फैसले ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि सरकारी नौकरियों में चयन केवल योग्यता और निर्धारित नियमों के कठोर पालन के आधार पर ही होगा, न कि सामाजिक पृष्ठभूमि की आड़ में मिलने वाली किसी विशेष रियायत से।




