img

Prabhat Vaibhav, Digital Desk : एक तरफ शांति का सफेद झंडा और दूसरी तरफ युद्ध के नगाड़े! अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 'दोहरी नीति' ने इस समय पूरी दुनिया को असमंजस में डाल दिया है। ट्रंप ने जहाँ एक ओर दावा किया कि ईरान के साथ संघर्ष अब "समाप्ति के निकट" है, वहीं दूसरी ओर रातों-रात 10,000 अतिरिक्त अमेरिकी सैनिकों को मध्य पूर्व (Middle East) भेजकर खतरे की घंटी बजा दी है। पेंटागन के इस फैसले के बाद खाड़ी क्षेत्र में बारूद की गंध और तेज हो गई है।

सैन्य शक्ति में भारी इजाफा: समुद्र से जमीन तक घेराबंदी

पेंटागन की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने अपनी सैन्य ताकत को कई गुना बढ़ा दिया है। भेजे गए 10,000 नए सैनिकों में से अकेले 6,000 सैनिकों को अत्याधुनिक विमानवाहक पोत 'यूएसएस जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश' पर तैनात किया गया है। इसके अलावा, 4,200 मरीन सैनिक 'बॉक्सर एम्फीबियस रेडी ग्रुप' के साथ वहां पहुंचे हैं। बता दें कि खाड़ी देशों में पहले से ही 50,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जो किसी भी आपात स्थिति के लिए 'स्टैंडबाय' मोड पर हैं।

तीन घातक विमानवाहक पोतों की तैनाती: होर्मुज में बढ़ी हलचल

नौसेना की ताकत के मामले में अमेरिका ने अब तक की सबसे बड़ी मोर्चाबंदी की है। तीन विशालकाय और घातक विमानवाहक पोत— 'यूएसएस अब्राहम लिंकन', 'यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड' और 'यूएसएस जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश' —खाड़ी क्षेत्र के पास तैनात किए जा चुके हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में नाकाबंदी को लेकर तनाव चरम पर है, और ये पोत किसी भी समय बड़े सैन्य अभियान को अंजाम देने की क्षमता रखते हैं।

यूरेनियम और 22 अप्रैल की समय सीमा: क्यों नहीं बन रही बात?

विवाद की मुख्य जड़ ईरान का यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम है। ट्रंप प्रशासन का दबाव है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर पूरी तरह रोक लगाए, लेकिन अभी तक कोई ठोस समझौता नहीं हो पाया है। 22 अप्रैल की महत्वपूर्ण समय सीमा भी बिना किसी नतीजे के बीत चुकी है। हालाँकि, पर्दे के पीछे कूटनीतिक बातचीत जारी है, लेकिन जमीनी स्तर पर सेना का जमावड़ा कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है।

ट्रंप की रहस्यमयी चेतावनी: "दुनिया देखेगी कुछ चौंकाने वाला"

राष्ट्रपति ट्रंप के विरोधाभासी बयानों ने वैश्विक नेताओं की नींद उड़ा दी है। उन्होंने एक तरफ शांति का राग अलापा, तो दूसरी तरफ यह कहकर सनसनी फैला दी कि "अगले दो दिनों में दुनिया कुछ चौंकाने वाली घटनाएं देखेगी।" जानकारों का मानना है कि यह ट्रंप की 'प्रेशर टैक्टिस' (दबाव की राजनीति) भी हो सकती है, ताकि ईरान को बातचीत की मेज पर झुकने के लिए मजबूर किया जा सके। अब सवाल यह है कि क्या यह केवल मनोवैज्ञानिक युद्ध है या फिर दुनिया एक और विनाशकारी संघर्ष की दहलीज पर खड़ी है?