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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : दिल्ली से सटे हाई-टेक शहर नोएडा की सड़कों पर सोमवार को जो मजदूरों का हुजूम उतरा, उसकी जड़ें काफी गहरी हैं। यह महज एक दिन का गुस्सा नहीं, बल्कि सालों से कम वेतन और महंगाई की मार झेल रहे श्रमिकों का सब्र था जो अब टूट चुका है। आखिर 10-12 हजार की नौकरी करने वाला मजदूर 25 हजार की मांग क्यों कर रहा है? और क्यों बार-बार पड़ोसी राज्य हरियाणा और गुरुग्राम का जिक्र हो रहा है? आइए समझते हैं मजदूरी का पूरा गणित।

महंगाई के दौर में 300 रुपये दिहाड़ी, कैसे चले घर की गाड़ी?

प्रदर्शनकारी मजदूरों का सबसे बड़ा दर्द यह है कि नोएडा जैसे महंगे शहर में उन्हें आज भी मात्र 10 से 11 हजार रुपये महीना या करीब 300 रुपये रोजाना के हिसाब से भुगतान किया जा रहा है। मजदूरों का कहना है कि इतने कम पैसे में मकान का किराया, राशन और बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना नामुमकिन हो गया है। हैरानी की बात यह है कि ग्रामीण इलाकों में भी अब दिहाड़ी 500-600 रुपये तक पहुंच गई है, लेकिन नोएडा के बड़े कारखानों में शोषण का खेल बदस्तूर जारी है।

गुरुग्राम बनाम नोएडा: हरियाणा की एक नीति ने यूपी में लगा दी आग

श्रमिकों के इस आक्रोश के पीछे हरियाणा सरकार का एक ताजा फैसला है। 1 अप्रैल 2026 से हरियाणा सरकार ने न्यूनतम मजदूरी में करीब 35% की बंपर बढ़ोतरी कर दी है। नोएडा से चंद कदमों की दूरी पर स्थित गुरुग्राम (हरियाणा) में मजदूरी बढ़ गई, लेकिन नोएडा (यूपी) के मजदूर वहीं के वहीं रह गए।

हरियाणा में मजदूरी का नया ढांचा (1 अप्रैल 2026 से):

श्रमिक वर्गपहले वेतन (₹/माह)अब वेतन (₹/माह)कुल बढ़ोतरी
अकुशल मजदूर11,20015,20035.7%
अर्ध-कुशल मजदूर12,40016,70034.7%
कुशल मजदूर13,70018,50035.0%

मजदूरों का सीधा सवाल है— "जब हरियाणा सरकार वेतन बढ़ा सकती है, तो उत्तर प्रदेश सरकार क्यों नहीं?"

ज्यादा काम, कोई ओवरटाइम नहीं और अमानवीय स्थितियां

वेतन के अलावा मजदूरों ने फैक्ट्री मालिकों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। मजदूरों का कहना है कि उनसे तय 8 घंटे से कहीं ज्यादा काम लिया जाता है, लेकिन ओवरटाइम का एक पैसा नहीं मिलता। महिला कर्मचारियों के हालात और भी चिंताजनक हैं; उन्हें काम के दौरान अपनी जगह से हिलने तक की इजाजत नहीं दी जाती। इसी 'अमानवीय' कार्यप्रणाली के खिलाफ अब मजदूरों ने आर-पार की जंग छेड़ दी है।

क्या हैं मजदूरों की प्रमुख मांगें?

मजदूरों ने प्रशासन के सामने अपनी मांगों की सूची रखी है, जिसे वे अपना बुनियादी हक मान रहे हैं:

मासिक वेतन कम से कम 20,000 से 25,000 रुपये किया जाए।

दैनिक मजदूरी की न्यूनतम दर 600 रुपये तय हो।

ओवरटाइम का भुगतान पारदर्शी तरीके से किया जाए।

कंपनियां इन मांगों पर लिखित आश्वासन दें।

कागज पर नियम सख्त, जमीन पर हकीकत कुछ और

केंद्र सरकार के नियमों के मुताबिक, अकुशल श्रमिक की न्यूनतम मजदूरी 783 रुपये प्रतिदिन होनी चाहिए, जबकि कुशल श्रमिक के लिए यह 954 रुपये तय है। लेकिन समस्या यह है कि इन दरों को लागू करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी होती है। नोएडा में नियम तो हैं, लेकिन फैक्ट्रियों में इनका पालन न होना ही इस पूरे विवाद और हिंसा की असली जड़ है।