Prabhat Vaibhav,Digital Desk : पवित्र गंगा को निर्मल बनाने के संकल्प 'नमामि गंगे' कार्यक्रम को लेकर उत्तराखंड में एक बड़ी लापरवाही सामने आई है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में राज्य सरकार के दावों की पोल खोल दी है। विधानसभा में पेश की गई इस रिपोर्ट के अनुसार, सीवेज प्रबंधन से लेकर कूड़ा निपटान तक, हर स्तर पर भारी कमियां पाई गई हैं। स्थिति यह है कि करोड़ों खर्च होने के बाद भी गंगा के पानी की गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतर पा रही है।
बिना ट्रीटमेंट के गंगा में गिर रहा सीवेज, 18 एसटीपी लेने से इनकार
कैग की रिपोर्ट में 2018-19 से 2022-23 की अवधि का ऑडिट किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य गंगा समिति और स्वच्छ गंगा मिशन स्थानीय समुदायों के साथ तालमेल बिठाने में पूरी तरह विफल रहे। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि उत्तराखंड जल संस्थान ने 18 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) को अपने हैंडओवर लेने से ही मना कर दिया। इसका कारण निर्माण और संचालन में पाई गई गंभीर खामियां बताई जा रही हैं। पर्याप्त क्षमता न होने के कारण आज भी कई शहरों का गंदा पानी बिना फिल्टर हुए सीधे गंगा की लहरों में मिल रहा है।
बजट का सिर्फ 16% हुआ खर्च, श्मशान घाट पड़े हैं खाली
रिपोर्ट में वित्तीय प्रबंधन पर भी कड़े सवाल उठाए गए हैं। ऑडिट में सामने आया कि नियोजित बजट का मात्र 16 प्रतिशत हिस्सा ही जमीन पर खर्च किया जा सका। वहीं, जन जागरूकता की कमी के कारण इस मिशन के तहत बनाए गए आधुनिक श्मशान घाटों का इस्तेमाल ही नहीं हो रहा है। यही नहीं, नदी तट के शहरों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management) की हालत इतनी खराब है कि कूड़े को या तो नदी की ढलानों पर फेंक दिया जा रहा है या जलाया जा रहा है, जो अंततः बहकर फिर से गंगा में ही समा जाता है।
पानी की क्वालिटी में सुधार नहीं: ऋषिकेश-हरिद्वार अब भी 'B' श्रेणी में
गंगा की शुद्धता के दावों के बीच कैग ने आंकड़ों के जरिए सच्चाई बयां की है। रिपोर्ट के अनुसार:
देवप्रयाग: यहां तक गंगा का जल 'A' श्रेणी (पीने योग्य) में है।
ऋषिकेश: 2019 से 2023 के बीच यहां जल की गुणवत्ता 'B' श्रेणी में बनी रही। केवल कोविड काल में मानवीय गतिविधियां रुकने से यह कुछ समय के लिए 'A' श्रेणी में आई थी।
हरिद्वार: यहां पूरी ऑडिट अवधि के दौरान गंगा का पानी लगातार 'B' श्रेणी में रहा, जो मानकों के हिसाब से चिंताजनक है।
सुरक्षा जांच में चूक और जानमाल का नुकसान
कैग ने एसटीपी की समय पर सुरक्षा जांच न होने पर भी गहरी आपत्ति जताई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तकनीकी ऑडिट और मॉनिटरिंग के अभाव में न केवल सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचा, बल्कि अनावश्यक जानमाल की हानि भी हुई। वन संरक्षण के कार्यों में भी कोई खास प्रगति नहीं देखी गई। ऑडिट में कुल 42 परियोजनाओं की जांच की गई थी, जिनमें से अधिकांश एनजीटी (NGT) और भारत सरकार के कड़े मानकों का पालन करने में विफल रहीं।




