Prabhat Vaibhav,Digital Desk : रमजान के पवित्र महीने के समापन के साथ ही पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत में भी ईद-उल-फितर का बेसब्री से इंतजार शुरू हो जाता है। लेकिन हर साल एक सवाल आम लोगों और खासकर युवाओं के मन में जरूर आता है कि आखिर भारत में ईद की तारीख का आधिकारिक एलान कौन करता है? क्या इसके पीछे कोई संवैधानिक संस्था है या धार्मिक गुरुओं का फैसला ही अंतिम होता है? भारत में ईद की तारीख का सीधा संबंध चंद्रमा के दीदार और दिल्ली की जामा मस्जिद के 'शाही इमाम' से जुड़ा होता है। आइए विस्तार से समझते हैं कि भारत में ईद की घोषणा की पूरी प्रक्रिया क्या है और इसके पीछे का धार्मिक तर्क क्या है।
हिलाल कमेटी और चंद्रमा के दीदार की अहमियत
इस्लामिक कैलेंडर पूरी तरह से चंद्रमा की चाल पर आधारित है, जिसे हिजरी कैलेंडर कहा जाता है। ईद-उल-फितर रमजान के 29 या 30 रोजों के बाद शव्वाल महीने की पहली तारीख को मनाई जाती है। भारत में ईद की तारीख तय करने की मुख्य जिम्मेदारी 'मरकजी रूयत-ए-हिलाल कमेटी' (Central Moon Sighting Committee) की होती है। इस कमेटी में उलेमा और खगोलीय गणना के जानकार शामिल होते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों जैसे केरल, लद्दाख या पूर्वोत्तर में अगर चांद दिख जाता है, तो इसकी तस्दीक (पुष्टि) दिल्ली स्थित मुख्य कमेटी को की जाती है। जब चांद दिखने की गवाही पुख्ता हो जाती है, तभी ईद का एलान किया जाता है।
दिल्ली के शाही इमाम और ईद की घोषणा का कनेक्शन
ऐतिहासिक रूप से दिल्ली की जामा मस्जिद और फतेहपुरी मस्जिद के 'शाही इमाम' की घोषणा को पूरे देश में बेहद प्रामाणिक माना जाता है। जामा मस्जिद के शाही इमाम देशभर की स्थानीय हिलाल कमेटियों से संपर्क साधते हैं। जैसे ही देश के किसी भी हिस्से से चांद दिखने की विश्वसनीय खबर आती है, शाही इमाम आधिकारिक तौर पर ईद की तारीख का एलान करते हैं। उनकी इस घोषणा के बाद ही देशभर की मस्जिदों और ईदगाहों में नमाज का समय तय किया जाता है। हालांकि, आधुनिक दौर में अब सोशल मीडिया और समाचार चैनलों के माध्यम से यह जानकारी मिनटों में फैल जाती है, लेकिन धार्मिक रूप से शाही इमाम का बयान आज भी अंतिम मुहर माना जाता है।
क्या अलग-अलग दिन भी हो सकती है ईद?
अक्सर देखा जाता है कि खाड़ी देशों (सऊदी अरब, दुबई) में ईद भारत से एक दिन पहले मनाई जाती है। इसका मुख्य कारण भौगोलिक स्थिति है। चंद्रमा का उदय दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग समय पर होता है। भारत में भी कभी-कभी ऐसा होता है कि केरल या दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में चांद पहले दिख जाता है, जिससे वहां ईद एक दिन पहले हो जाती है, जबकि उत्तर भारत में अगले दिन मनाई जाती है। इस्लाम में नियम यह है कि जिस क्षेत्र में चांद दिखे, वहीं के लोग ईद मनाएं। यही कारण है कि भौगोलिक दूरियों की वजह से ईद की तारीखों में एक या दो दिन का अंतर देखने को मिलता है।
नई तकनीक और खगोलीय गणनाओं का बढ़ता प्रभाव
आज के समय में चांद की स्थिति जानने के लिए आधुनिक टेलिस्कोप और खगोलीय गणनाओं का सहारा भी लिया जाने लगा है। इससे यह पहले ही अनुमान लग जाता है कि चांद किस समय और किस दिशा में दिखेगा। हालांकि, पारंपरिक रूप से आज भी 'आंखों से चांद देखने' (Physical Sighting) की परंपरा को ही सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। हिलाल कमेटी तब तक घोषणा नहीं करती जब तक कि कम से कम दो विश्वसनीय गवाह यह न कह दें कि उन्होंने अपनी आंखों से शव्वाल का चांद देखा है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी उसी शुद्धता के साथ निभाई जाती है।
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